कुरान - 46:5 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

5
وَمَنۡ أَضَلُّ مِمَّن يَدۡعُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَن لَّا يَسۡتَجِيبُ لَهُۥٓ إِلَىٰ يَوۡمِ ٱلۡقِيَٰمَةِ وَهُمۡ عَن دُعَآئِهِمۡ غَٰفِلُونَ

Transliteration: (Wa man adallu mimmany yad'oo min doonil laahi mallaa yastajeebu lahooo ilaa Yawmil Qiyaamati wa hum'an du'aaa'ihim ghaafiloon)

और उससे बढ़कर कौन गुमराह [10] है जो अल्लाह के सिवा ऐसे को पूजे जो क़ियामत के दिन तक उसकी बात न सुन सके [11], बल्कि वे उनकी पूजा से बिल्कुल बे-ख़बर [12] हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 5 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 5

"और उससे बढ़कर कौन गुमराह [10] है जो अल्लाह के सिवा ऐसे को पूजे जो क़ियामत के दिन तक उसकी बात न सुन सके [11], बल्कि वे उनकी पूजा से बिल्कुल बे-ख़बर [12] हैं।"

[10] गुमराही की इंतिहा

उस शख़्स से ज़्यादा भटका हुआ कौन हो सकता है जो अपने ख़ालिक़ को छोड़कर बे-जान पत्थरों और बुतों के आगे माथा टेकता है।

[11] बे-जान बुत सुनने की सलाहियत से महरूम हैं

वे बुत क़ियामत तक भी किसी की फ़रियाद नहीं सुन सकते और न किसी दुआ का जवाब दे सकते हैं।

[12] इबादत से बे-ख़बरी (बुतों बनाम अंबिया व औलिया का फ़र्क़)

यहाँ लफ़्ज़ ‘बे-ख़बर’ पत्थरों और बुतों के लिए आया है जो पूरी तरह बे-जान और जमादात हैं। यह आयत बुतों के बारे में है। अंबिया-ए-किराम और औलिया-ए-इज़ाम अल्लाह के इज़्न से सुनते भी हैं और मदद भी फ़रमाते हैं, जैसा कि हदीस-ए-पाक और अहादीस-ए-सहाबा से साबित है। लिहाज़ा बुतों की आयतों को अल्लाह के मक़बूल बंदों पर फ़िट करना सख़्त गुमराही और ख़ारिजियत है।

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