कुरान - 46:3 सूरह अल-अहक़ाफ़ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
مَا خَلَقۡنَا ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ وَمَا بَيۡنَهُمَآ إِلَّا بِٱلۡحَقِّ وَأَجَلٖ مُّسَمّٗىۚ وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ عَمَّآ أُنذِرُواْ مُعۡرِضُونَ

Transliteration: (Maa khalaqnas samaawaati wal arda wa maa bainahumaaa illaa bilhaqqi wa ajalim musammaa; wallazeena kafaroo 'ammaaa unziroo mu'ridoon)

हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके दरमियान है, सिर्फ़ हक़ [4] के साथ और एक मुक़र्ररा मुद्दत [5] के लिए पैदा फ़रमाया है; और काफ़िर लोग उस चीज़ से मुंह फेरते हैं जिससे उन्हें डराया गया [6] है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहक़ाफ़ आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहक़ाफ़ तफ़सीर - आयत 3

"हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके दरमियान है, सिर्फ़ हक़ [4] के साथ और एक मुक़र्ररा मुद्दत [5] के लिए पैदा फ़रमाया है; और काफ़िर लोग उस चीज़ से मुंह फेरते हैं जिससे उन्हें डराया गया [6] है।"

[4] हक़ और हिकमत के तहत तख़लीक़

कायनात की तख़लीक़ कोई बे-मक़सद खेल नहीं, बल्कि इसे हक़ और अज़ीम हिकमत के तहत बनाया गया है—ताकि इंसान अपने रब को पहचाने और उसकी इबादत करे।

[5] मुक़र्ररा मुद्दत (क़ियामत का तयशुदा वक़्त)

इस दुनिया और आसमान व ज़मीन की ज़िंदगी हमेशा रहने वाली नहीं, बल्कि इसका एक मुक़र्ररा वक़्त और मुद्दत तय है। जब वह वक़्त पूरा होगा, तो क़ियामत बरपा होगी और हर जान को अपने आमाल का हिसाब देना होगा।

[6] मुनकिरीन की ग़फ़लत और मुंह फेरना

काफ़िरों का हाल यह है कि जब उन्हें क़ियामत और अज़ाब से डराया जाता है, तो वे तौबा करने के बजाय हक़ से मुंह फेर लेते हैं और अपनी सरकशी पर अड़े रहते हैं।

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