Transliteration: (Qul maa kuntu bid'am minal Rusuli wa maaa adreee ma yuf'alu bee wa laa bikum in attabi'u illaa maa yoohaaa ilaiya wa maaa ana illaa nazeerum mubeen)
"आप फ़रमाइए: 'मैं कोई अनोखा (पहला) रसूल नहीं हूँ [23], और मुझे (अपनी ज़ात से) नहीं मालूम [24] कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और तुम्हारे साथ क्या। मैं तो सिर्फ़ उसी की पैरवी करता हूँ जो मेरी तरफ़ वह्य [25] की जाती है, और मैं तो महज़ साफ़-साफ़ डराने वाला [26] हूँ'।"
‘अनोखा रसूल नहीं’ (मा कुन्तु बिदअ़म-मिनर-रूसुल)—यानी मैं कोई बे-बुनियाद या पहला नबी नहीं हूँ। मुझसे पहले सैकड़ों अंबिया तशरीफ़ ला चुके हैं, किताबें आ चुकी हैं, मोजिज़ात ज़ाहिर हो चुके हैं। फिर मेरी रिसालत पर तअज्जुब कैसा?
यहाँ “मुझे नहीं मालूम” से मुराद ज़ाती इल्म (बिना वह्य का इल्म) की नफ़ी है, न कि मुतलक़ इल्म की। अल्लाह तआला ने वह्य के ज़रिए हुज़ूर ﷺ को दोनों जहानों, दुनिया व आख़िरत और क़ियामत के तमाम अहवाल का कामिल इल्म अता फ़रमाया है।
क़ुरआन फ़रमाता है: “ताकि अल्लाह आपके सब अगले और पिछले गुनाह माफ़ फ़रमाए” (सूरह फ़तह 48:2) और “ताकि आप लोगों पर गवाह बनें” (सूरह बक़रह 2:143)। जो नबी क़ियामत के दिन तमाम उम्मतों पर गवाह होगा, वह लोगों के अहवाल से कैसे बे-ख़बर हो सकता है? चुनांचे यह आयत अल्लाह की अता से मिले इल्म-ए-ग़ैब की नफ़ी नहीं करती, बल्कि यह बताती है कि हुज़ूर ﷺ का इल्म वह्य-ए-इलाही के ताबेअ है।
हुज़ूर ﷺ का हर क़ौल, फ़ेल और इल्म वह्य-ए-इलाही पर मबनी है। आपकी ज़ात-ए-मुबारका अल्लाह की अता की मुजस्सम तस्वीर है।
आप साफ़-साफ़ हक़ का पैग़ाम पहुँचाने और बुरे अंजाम से डराने वाले हैं। किसी के ईमान लाने या न लाने से आपकी शान में कोई कमी नहीं आ सकती।
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