Transliteration: (Allazeena yuballighoona Risaalaatil laahi wa yakhshaw nahoo wa laa yakkhshawna ahadan illal laah; wa kafaa billaahi Haseebaa)
"वे जो अल्लाह के पैग़ामात पहुंचाते हैं और उसी से डरते हैं, और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते [109]। और हिसाब लेने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है।"
यह आयत उन मुक़द्दस हस्तियों का वस्फ़ बयान करती है जो अल्लाह के पैग़ामात पहुंचाते हैं—यानी अंबिया-ए-किराम, और उनके वसीले से उम्मत के सच्चे उलमा और मुसलेहीन। उनकी बुनियादी सिफ़त यह है कि वे अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते, न बादशाहों से, न ज़ालिमों से और न ही अवामी मुख़ालिफ़त से।
वे मुख़ालिफ़त और धमकियों की परवाह किए बग़ैर अपने मिशन पर साबित-क़दम रहते हैं। कोई भी दुनियावी दबाव उन्हें हक़ छुपाने या उसमें रद्दोबदल करने पर मजबूर नहीं कर सकता। दावत व तब्लीग़ में यह इख़्लास और शुजाअत इलाही रसूलों और सच्चे मोमिनों का ख़ास तग़मा है।
अल्लाह तआला ही लोगों के आमाल और नियतों का हिसाब लेने के लिए काफ़ी है—ख़्वाह वे पैग़ाम पहुँचाने वाले हों या उनके मुख़ातब।
यह आयत हक़ की तब्लीग़ करने वालों के लिए तसल्ली और क़ुव्वत का सबब है, जो उन्हें भरोसा दिलाती है कि उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ बे-ख़ौफ़ होकर पैग़ाम पहुँचाना है, और नतीजे व हिसाब की ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला पर है।
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