कुरान - 33:38 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

38
مَّا كَانَ عَلَى ٱلنَّبِيِّ مِنۡ حَرَجٖ فِيمَا فَرَضَ ٱللَّهُ لَهُۥۖ سُنَّةَ ٱللَّهِ فِي ٱلَّذِينَ خَلَوۡاْ مِن قَبۡلُۚ وَكَانَ أَمۡرُ ٱللَّهِ قَدَرٗا مَّقۡدُورًا

Transliteration: (Maa kaana 'alan nabiyyyi min harajin feemaa faradal laahu lahoo sunnatal laahi fil lazeena khalaw min qabl; wa kaana amrul laahi qadaram maqdooraa)

नबी पर उस काम में कोई हरज (रुकावट) नहीं जो अल्लाह ने उनके लिए मुक़र्रर फ़रमा दिया हो [106]; यही अल्लाह का दस्तूर उन (अंबिया) में रहा है जो पहले गुज़र चुके हैं [107]; और अल्लाह का हुक्म एक तयशुदा फ़ैसला [108] होता है; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 38 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 38

"नबी पर उस काम में कोई हरज नहीं जो अल्लाह ने उनके लिए मुक़र्रर फ़रमा दिया हो [106]। यही अल्लाह का दस्तूर उन लोगों में रहा है जो पहले गुज़र चुके हैं [107]। और अल्लाह का हुक्म एक तयशुदा फ़ैसला है [108]।"

[106] निकाहे नबवी अम्रे इलाही के तहत था

इसका मफ़हूम यह है: ऐ मेरे महबूब! लोगों के तानों से आप बिल्कुल रंजीदा न हों। जो कुछ अल्लाह तआला ने आपके लिए हलाल व मुक़र्रर फ़रमा दिया, किसी को उस पर एतिराज़ करने का कोई हक़ नहीं। हुज़ूर ﷺ ने सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म की पैरवी फ़रमाई; हज़रत ज़ैनब से आपका निकाह कोई ज़ाती ख़्वाहिश न थी बल्कि एक इलाही फ़रीज़ा था जिसका मक़सद बातिल रस्मों को तोड़ना और शरई अहकाम को वाज़ेह करना था।

[107] पिछले अंबिया-ए-किराम की नज़ीर

यहूद और नसारा के इस एतिराज़ के जवाब में कि हुज़ूर ﷺ के निकाह में चार से ज़ायद अज़वाज क्यों हैं, यह वाज़ेह फ़रमाया गया कि अंबिया-ए-किराम के लिए ख़ास शरई अहकाम होते हैं। मिसाल के तौर पर:

  • हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) के निकाह में 100 अज़वाज थीं

  • हज़रत सुलैमान (अलैहिस्सलाम) के निकाह में 300 अज़वाज थीं
    ये मिसालें साबित करती हैं कि अंबिया-ए-किराम आम क़वानीन से मुस्तस्ना (अलग) थे, और तारीख़ में किसी भी क़ौम ने इस पर कभी एतिराज़ नहीं किया। यहाँ तक कि आर्य और हिंदू मज़ाहिब में भी कसीर अज़वाज वाली अज़ीम हस्तियों को तस्लीम किया गया है।

[108] नबियों के निकाहों में इलाही हिकमतें

अंबिया के निकाह अम्रे इलाही और अज़ीम हिकमतों से भरपूर होते हैं—जैसे कि इस्लाम की तब्लीग़, क़बीलों का इत्तिहाद, या अहम शरई अहकाम का क़याम। आयत ताकीद फ़रमाती है कि अल्लाह का हुक्म तयशुदा और अटल होता है, और हुज़ूर ﷺ जो कुछ भी इलाही हुक्म के तहत फ़रमाते हैं वह इंसानी बहस व तकरार से बहुत बुलंद है।

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