कुरान - 33:36 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

36
وَمَا كَانَ لِمُؤۡمِنٖ وَلَا مُؤۡمِنَةٍ إِذَا قَضَى ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَمۡرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ ٱلۡخِيَرَةُ مِنۡ أَمۡرِهِمۡۗ وَمَن يَعۡصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلَٰلٗا مُّبِينٗا

Transliteration: (Wa maa kaana limu'mininw wa laa mu'minatin izaa qadal laahu wa Rasooluhooo amran ai yakoona lahumul khiyaratu min amrihim; wa mai ya'sil laaha wa Rasoolahoo faqad dalla dalaalam mubeenaa)

और किसी मोमिन मर्द [93] और किसी मोमिन औरत के लिए यह जाइज़ नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला फ़रमा दें [94], तो उनके लिए अपने मामले में कोई इख़्तियार [95] बाक़ी रहे; और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे तो वह खुली गुमराही में जा पड़ा [96] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 36 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 36

"और किसी मोमिन मर्द [93] और किसी मोमिन औरत के लिए यह जाइज़ नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला फ़रमा दें [94], तो उनके लिए अपने मामले में कोई इख़्तियार [95] बाक़ी रहे। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे तो वह खुली गुमराही में जा पड़ा [96]।"

[93] शाने नुज़ूल

यह आयत हज़रत ज़ैनब बिन्ते जहश, उनके भाई अब्दुल्लाह इब्ने जहश, और उनकी वालिदा उमैमा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब (जो हुज़ूर ﷺ की फूफ़ी थीं) के मामले में नाज़िल हुई। हुज़ूर ﷺ ने अपने आज़ाद-कर्दा ग़ुलाम और लेपालक हज़रत ज़ैद बिन हारिसा (रज़ियल्लाहु अन्हु) के लिए निकाह का पैग़ाम भेजा। इब्तिदा में हज़रत ज़ैनब ने अपने ख़ानदानी वक़ार के पेशेनज़र इंकार फ़रमाया। इस पर यह आयत नाज़िल हुई जिसमें हुक्मे नबवी पर सर-ए-तस्लीम ख़म करने की ताकीद फ़रमाई गई, जिसके बाद उन्होंने फ़ौरन रज़ामंदी ज़ाहिर फ़रमाई और हज़रत ज़ैद से निकाह हो गया।

[94] हुक्म और मशविरे का फ़र्क़

यह आयत-ए-मुबारका इलाही हुक्म और नबवी मशविरे के दरमियान वाज़ेह फ़र्क़ तय फ़रमाती है:

  • हुक्म वाजिबुल इताअत होता है जिसमें मुकम्मल फ़रमांबरदारी लाज़िम है।

  • मशविरा ज़ाती राय की गुंजाइश रखता है।
    चुनांचे "जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला फ़रमा दें" का फ़रमान यह साफ़ करता है कि कोई मोमिन अपनी मर्ज़ी के नाम पर इलाही फ़ैसले की मुख़ालिफ़त नहीं कर सकता।

[95] इलाही फ़ैसले में ज़ाती इख़्तियार की नफ़ी

यह ताकीद फ़रमाता है कि जिन मामलात में अल्लाह और उसके प्यारे रसूल ﷺ का हुक्म आ जाए, वहाँ मोमिनीन को अपनी ज़ाती राय को तरजीह देने का कोई हक़ नहीं। निकाह जैसे ज़ाती मामले में भी जब हुज़ूर ﷺ का वाज़ेह हुक्म आ जाए, तो मोमिन पर इताअत लाज़िम हो जाती है, जैसा कि हज़रत ज़ैनब ने आयत नाज़िल होते ही फ़रमाया।

[96] नाफ़रमानी खुली गुमराही है

यहाँ से कई अज़ीम शरई अहकाम साबित होते हैं:

  1. हुज़ूर ﷺ का हुक्म तमाम मोमिनीन पर फ़र्ज़ और लाज़िम है।

  2. हुज़ूर ﷺ को अहले ईमान की जान और माल पर कामिल इख़्तियार हासिल है।

  3. हुज़ूर ﷺ का हुक्म माँ-बाप के हुक्म पर भी मुक़द्दम है।

  4. हुज़ूर ﷺ का हुक्म दर-अस्ल अल्लाह ही का हुक्म है; इसमें ज़रा सा भी तरद्दुद या हिचकिचाहट कुफ़्र व इरतिदाद तक पहुँचा सकती है।

आयत का इख़्तिताम इस चेतावनी पर होता है कि जो कोई अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की नाफ़रमानी करता है वह महज़ ग़लती पर नहीं, बल्कि खुली और वाज़ेह गुमराही में जा पड़ा है।

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