Transliteration: (Wa iz taqoolu lillazeee an'amal laahu 'alaihi wa an'amta 'alaihi amsik 'alaika zawjaka wattaqil laaha wa tukhfee fee nafsika mal laahu mubdeehi wa takhshan naasa wallaahu ahaqqu an takhshaah; falammaa qadaa Zaidum minhaa wataran zawwajnaa kahaa likay laa yakoona 'alal mu'mineena harajun feee azwaaji ad'iyaaa'ihim izaa qadaw minhunna wataraa; wa kaana amrul laahi maf'oolaa)
"और (ऐ महबूब!) याद कीजिए जब आप उस शख़्स से कह रहे थे जिस पर अल्लाह ने एहसान फ़रमाया [97], और आपने भी उस पर एहसान किया [98], ‘अपनी बीवी को अपने निकाह में रखो [99] और अल्लाह से डरो [100]।’ और आप अपने दिल में वह बात रखे हुए थे जिसे अल्लाह ज़ाहिर करने वाला था [101], और आप लोगों के तानों का अंदेशा फ़रमाते थे [102]। हालाँकि अल्लाह इसका ज़्यादा हक़दार है कि आप उससे डरें [103]। फिर जब ज़ैद ने उससे अपना तअल्लुक़ ख़त्म कर लिया, तो हमने उसका निकाह आपसे कर दिया [104], ताकि मोमिनों पर अपने मुंह-बोले बेटों की बीवियों के बारे में कोई हरज न रहे जब वे उनसे अपनी हाजत पूरी कर लें। और अल्लाह का हुक्म पूरा होकर ही रहता है [105]।"
हज़रत ज़ैद बिन हारिसा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को अल्लाह की ख़ास नेमतें हासिल थीं: ईमान, दीनी इल्म, और हुज़ूर ﷺ की क़ुर्बत। हुज़ूर ﷺ ने भी उन्हें आज़ाद फ़रमा कर, अपनी सोहबत का शरफ़ बख़्श कर और अपने घराने का फ़र्द बनाकर उन पर अज़ीम एहसान फ़रमाया था।
यह कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ दोनों बंदों पर एहसान फ़रमाते हैं। ख़ुद अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: "अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से ग़नी कर दिया" (सूरह अत-तौबा: 74)। लिहाज़ा हुज़ूर ﷺ का एहसान भी दर-अस्ल अल्लाह ही का एहसान है।
हज़रत ज़ैद और हज़रत ज़ैनब के निकाह के बाद दोनों के मिज़ाज में वाज़ेह फ़र्क़ की वजह से घरेलू इत्तिफ़ाक़ न हो सका:
हज़रत ज़ैनब आला ख़ानदान से थीं, निहायत हसीन और हुज़ूर ﷺ के ख़ानदान से तअल्लुक़ रखती थीं।
हज़रत ज़ैद अगरचे मुत्तक़ी थे, मगर आज़ाद-कर्दा ग़ुलाम थे।
चुनांचे मिज़ाज के इख़्तिलाफ़ की वजह से जब हज़रत ज़ैद ने दिल-बर्दाश्ता होकर तलाक़ का इरादा ज़ाहिर किया, तो हुज़ूर ﷺ ने उन्हें सब्र करने और निकाह क़ायम रखने की नसीहत फ़रमाई।
"अल्लाह से डरो" का हुक्म हज़रत ज़ैद को इसलिए दिया गया ताकि वे अपनी बीवी के बारे में कोई ग़लत बात न कहें और उनके साथ पूरा इंसाफ़ बरतें।
हुज़ूर ﷺ को वह्य के ज़रिये पहले ही मालूम हो चुका था कि यह निकाह दायमी नहीं रहेगा, और हज़रत ज़ैनब का निकाह ख़ुद हुज़ूर ﷺ से होगा। लेकिन आपने हिकमत और मस्लहत के तहत इस इलाही फ़ैसले को पहले से ज़ाहिर न फ़रमाया, जिससे यह सबक़ मिलता है कि हुज़ूर ﷺ वह्य के ज़रिये गै़ब जानकर भी सिर्फ़ वही ज़ाहिर फ़रमाते हैं जितना अल्लाह की मन्शा होती है।
हुज़ूर ﷺ को लोगों की बदगुमानी का अंदेशा था—कि मुनाफ़िक़ और काफ़िर यह झूठा प्रोपेगैंडा करेंगे कि हुज़ूर ﷺ ने अपनी "बहू" से निकाह कर लिया (क्योंकि ज़ैद को लेपालक बेटा कहा जाता था)। यह आयत साबित करती है कि अपनी इज़्ज़त को तोहमत से बचाना एक फ़ितरी अमर है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि अल्लाह के हुक्म पर अमल करना हर चीज़ पर मुक़द्दम है, ख़्वाह लोग इस पर कितने ही ताने क्यों न कसें। शरई हक़ीक़त दुनियावी रस्मों और सामाजिक दबाव पर ग़ालिब रहती है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "हमने उसका निकाह आपसे कर दिया", जो यह साबित करता है कि हुज़ूर ﷺ के आफ़आल मन्शिए इलाही का आईना हैं। जिस तरह अल्लाह अपने प्यारे रसूल ﷺ के लिए किसी ग़ैर-मुस्तहिक़ को पसंद नहीं फ़रमा सकता, उसी तरह यह आयत हज़रत ज़ैनब की अज़ीम पाकीज़गी और इस निकाह के मुक़द्दस तरीन होने की खुली सनद है।
यह निकाह इस जाहिली रस्म को हमेशा के लिए ख़त्म करने के वास्ते हुआ कि लेपालक सगे बेटे जैसा होता है। इस्लाम ने साफ़ कर दिया कि मुंह-बोला बेटा सगे बेटे जैसा नहीं होता, और तलाक़ व इद्दत के बाद उसकी बीवी से निकाह बिल्कुल हलाल और जाइज़ है।
हज़रत ज़ैद (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़ुद हुज़ूर ﷺ का पैग़ाम लेकर हज़रत ज़ैनब के पास गए। उन्होंने फ़रमांबरदारी से जवाब दिया:
"मैं इस मामले में कोई राय नहीं रखती, जो मेरे रब को मंज़ूर है मैं उसी पर राज़ी हूँ।"
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