Transliteration: (Innal muslimeena wal muslimaati wal mu'mineena wal mu'minaati walqaaniteena walqaanitaati wassaadiqeena wassaadiqaati wassaabireena wassaabiraati walkhaashi'eena walkhaashi'aati walmutasaddiqeena walmutasaddiqaati wassaaa'imeena wassaaa'imaati walhaafizeena furoojahum walhaafizaati waz zaakireenal laaha kaseeranw waz zaakiraati a'addal laahu lahum maghfiratanw wa ajran 'azeemaa)
"बेशक मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें, और मोमिन मर्द और मोमिन औरतें, और फ़रमांबरदार मर्द और फ़रमांबरदार औरतें, और सच्चे मर्द और सच्ची औरतें [90], और सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें, और आजिज़ी करने वाले मर्द और आजिज़ी करने वाली औरतें, और सदक़ा देने वाले मर्द और सदक़ा देने वाली औरतें, और रोज़ा रखने वाले मर्द और रोज़ा रखने वाली औरतें, और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करने वाले मर्द और हिफ़ाज़त करने वाली औरतें [91], और कसरत से अल्लाह का ज़िक्र करने वाले मर्द और औरतें [92]—इन सब के लिए अल्लाह ने मग़फ़िरत और बहुत बड़ा अज्र तैयार कर रखा है।"
जब पिछली आयात में हुज़ूर ﷺ की अज़वाज-ए-मुतह्हरात के आला औसाफ़ का ज़िक्र फ़रमाया गया, तो हज़रत अस्मा बिन्ते उमैस (रज़ियल्लाहु अन्हा) और दीगर मोमिन औरतों ने अर्ज़ किया: “अगर हममें भी कोई ख़ूबी होती तो हमारे बारे में भी आयात नाज़िल होतीं।” इसके जवाब में यह आयत नाज़िल हुई, जिसने वाज़ेह तौर पर मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों दोनों के मुत्तहिदा नेक औसाफ़ को उजागर फ़रमाया। (तफ़्सीर रूहुल बयान)
यह आयत-ए-करीमा दस रूहानी और अख़लाक़ी सिफ़ात का ख़ूबसूरत ख़ाका पेश करती है जो मर्दों और औरतों दोनों में यकसां क़ाबिले तारीफ़ हैं:
अल्लाह और उसके रसूल पर पुख़्ता ईमान और बातिनी इताअत
क़ौल व फ़ेल में सच्चाई और रास्तबाज़ी
मुसीबतों और आज़माइशों पर सब्र व इस्तक़ामत
नमाज़ और ज़िंदगी में आजिज़ी व ख़ूशूअ
राह-ए-ख़ुदा में सख़ावत और सदक़ा देना
नफ़्स की पाकीज़गी के लिए रोज़ा रखना
इफ़्फ़त व पाकदामनी और शर्मो-हया की हिफ़ाज़त करना
यह आयत साबित करती है कि जज़ा और सवाब का मदार तक़वे पर है, जिंस (मर्द या औरत होने) पर नहीं, क्योंकि अल्लाह की बारगाह में दोनों बराबर ज़िम्मेदार और मुस्तहिक़ हैं।
“अल्लाह का कसरत से ज़िक्र करने वाले” के मफ़हूम में शामिल हैं:
दिल और ज़बान दोनों से ज़िक्रे इलाही
नमाज़ के अलावा दिन-रात के तमाम औक़ात में तस्बीह व तहलील
रात की इबादत (तहज्जुद)
दीनी इल्म के हासिल करने और फैलाने में मशग़ूल रहना
कोई भी नेक अमल जो अल्लाह की याद को दिल में रखकर ख़ालिस नियत से किया जाए
यह तालीम देता है कि ज़िक्रुल्लाह की कई सूरतें हैं और यह अल्लाह तआला की क़ुर्बत हासिल करने की सबसे अज़ीम कुंजी है।
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