Transliteration: (Wa qarna fee bu yoo tikunna wa laa tabarrajna tabarrujal Jaahiliyyatil oolaa wa aqimnas Salaata wa aaateenaz Zakaata wa ati'nal laaha wa Rasoolah; innamaa yureedul laahu liyuzhiba 'ankumur rijsa Ahlal Bayti wa yutahhirakum tatheeraa)
"और अपने घरों में ठहरी रहो [83] और पुरानी जाहिलियत की तरह बे-परदगी न करो [84]। और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो और अल्लाह और उसके रसूल के अहकाम की फ़रमांबरदारी करो [85]। अल्लाह तो बस यही चाहता है कि तुमसे हर क़िस्म की नापाकी को दूर रखे [86], ऐ अहले बैत [87], और तुम्हें ख़ूब सुथरा करके मुकम्मल पाक व साफ़ फ़रमा दे।"
यह आयत-ए-मुबारका साबित करती है कि औरतों के लिए परदा (हिजाब) फ़र्ज़ है और बग़ैर शरई ज़रूरत के घर से बाहर निकलना मना है। हुज़ूर ﷺ की मुक़द्दस बीवियों को अहले बैत (घर वाले) कहकर मुख़ातब फ़रमाया गया क्योंकि हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस हुजरे बराहे रास्त आपसे जुड़े हुए हैं। यह याद रहे कि अगरचे ये मकानात रिहाइश के ऐतबार से उनके हैं, मगर वे हुज़ूर ﷺ की जायदाद की वारिस नहीं बनतीं, क्योंकि नबियों का तरका विसाल के बाद सदक़ा व वक़्फ़ हो जाता है।
ज़माना-ए-जाहिलियत में औरतें बनाव-सिंगार और ज़ीनत की नुमाइश के साथ बाज़ारों में घूमती थीं। मुसलमान औरतों को, बिलख़ुसूस उम्महातुल मुअमिनीन को, ऐसे तर्ज़े अमल से सख़्ती से रोका गया। उलमा बयान फ़रमाते हैं कि पहली जाहिलियत का दौर हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) के तूफ़ान तक था (लगभग 1272 साल), और दूसरी जाहिलियत का दौर हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) से लेकर हुज़ूर ﷺ की बअ़्सत तक था (तक़रीबन 600 साल)।
नमाज़ क़ायम करना, ज़कात अदा करना, और अल्लाह व उसके रसूल की इताअत करना मोमिन के बुनियादी फ़राइज़ हैं। रसूलुल्लाह ﷺ की इताअत अल्लाह की इताअत के बराबर है। चुनांचे हुज़ूर ﷺ की पैरवी और ख़िदमत बुनियादी इबादात की तरह ही लाज़िम व ज़रूरी है।
यहाँ मुज़क्कर (पुल्लिंग) ज़मीर का इस्तेमाल हुआ है क्योंकि लफ़्ज़ अहले बैत अरबी में मुज़क्कर है, अगरचे ख़िताब में अज़वाज-ए-मुतह्हरात शामिल हैं। बिल्कुल इसी तरह जैसे हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी ज़ौजा को मुज़क्कर ज़मीर से मुख़ातब फ़रमाया (सूरह अल-क़सस: 29), और फ़रिश्तों ने हज़रत सारा को "ऐ अहले बैत" कहा (सूरह हूद: 73)।
इसका मफ़हूम यह है कि अल्लाह तआला ने नबवी ख़ानदान—अज़वाज और औलाद—को तमाम रूहानी नापाकियों और गुनाहों से महफ़ूज़ फ़रमाया है, न यह कि वे पहले नापाक थे। यह उनकी फ़ितरी पाकीज़गी, इस्मत और अज़मत का ऐलान है।
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की अज़वाज और औलाद दोनों अहले बैत में शामिल हैं। हदीस-ए-किसा ("ऐ अल्लाह, ये मेरे अहले बैत हैं") आपकी औलाद (हज़रत फ़ातिमा, अली, हसन व हुसैन) की शमूलियत को साबित करती है, जबकि क़ुरआन में हज़रत आइशा के घर का ज़िक्र (सूरह आले इमरान: 121) और सूरह अल-अहज़ाब का यह पूरा सियाक़ो सबाक़ साबित करता है कि अज़वाज-ए-मुतह्हरात भी क़तई तौर पर अहले बैत हैं, क्योंकि यह ख़िताब बराहे रास्त उन्हीं को दिया गया है।
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