Transliteration: (Wa mai yaqnut minkunna lillaahi wa Rasoolihee wa ta'mal saalihan nu'tihaaa ajrahaa marratayni wa a'tadnaa lahaa rizqan kareema)
"और तुममें से जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमांबरदार रहेगी [77] और नेक अमल करेगी, हम उसे उसका अज्र दोहरा [78] अता फ़रमाएंगे, और हमने उसके लिए इज़्ज़तदार रिज़्क़ तैयार कर रखा है [79]।"
इसका मफ़हूम यह है कि हुज़ूर ﷺ की अज़वाज-ए-मुतह्हरात अल्लाह तआला और उसके रसूल की इताअत पर हमेशा साबित-क़दम रहें। यहाँ लफ़्ज़े 'जो कोई' सिर्फ़ बयान-ए-हुक्म के लिए है; इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि (मआज़अल्लाह) कोई बीवी नाफ़रमान थी, बल्कि हुज़ूर ﷺ की तमाम मुक़द्दस बीवियाँ कामिल तौर पर फ़रमांबरदार थीं। हुज़ूर ﷺ की इताअत दरहक़ीक़त ख़ुद अल्लाह तआला ही की इताअत है।
आम मोमिनीन को नेक आमाल का एक ख़ास पैमाना मिलता है, मगर हुज़ूर ﷺ की पाकीज़ा बीवियों से वादा फ़रमाया गया है कि उनका सवाब दोहरा होगा। मिसाल के तौर पर अगर किसी आम मोमिन को किसी नेकी पर पचास हज़ार का सवाब मिले, तो अज़वाज-ए-मुतह्हरात को एक लाख का सवाब मिलेगा। इसकी वजह यह है कि एक हिस्सा अल्लाह की इताअत और तक़वे का है, और दूसरा हिस्सा हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की रिज़ा-जोई का है—जो सिर्फ़ उन्हीं का ख़ास एज़ाज़ है।
इससे हम सवाब के मामले में हुज़ूर ﷺ की अज़वाज की अफ़ज़लियत को समझते हैं।
दोहरे अज्र के अलावा, अल्लाह तआला ने जन्नत में हुज़ूर ﷺ की अज़वाज के लिए ख़ास और इज़्ज़तदार रिज़्क़ (रिज़्क़े करीम) तैयार कर रखा है। यह उनके बुलंद मर्तबे और आख़िरत में हुज़ूर ﷺ की मुनफ़रिद रफ़ाक़त (सोहबत) को दर्शाता है, जो ऐसी नेमत है जो दूसरों को हासिल नहीं और जो इंसानी तसव्वुर से भी बालातर है।
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