Transliteration: (Yaa nisaaa'an Nabiyyi lastunna ka ahadim minan nisaaa'i init taqaitunna falaa takhda'na bilqawli fa yatma'al lazee fee qalbihee maradunw wa qulna qawlam ma'roofaa)
"ऐ नबी की बीवियो! तुम आम औरतों जैसी नहीं हो [80]। अगर तुम अल्लाह से डरती हो तो बात में ऐसी नर्मी न पैदा करो [81] कि जिसके दिल में बीमारी हो वह लालच करने लगे, और साफ़ व भली बात कहो [82]।"
हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की पाकीज़ा बीवियाँ हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर क़यामत तक की तमाम औरतों से अफ़ज़ल व बरतर हैं। हुज़ूर ﷺ की मुबारक ज़ात के साथ उनके ख़ास तअल्लुक़ की वजह से उनका मर्तबा ला-सानी है।
यहाँ 'औरतें' से मुराद ख़ास तौर पर हुज़ूर ﷺ की अज़वाज हैं। यह आयत इस हक़ीक़त को भी साबित करती है कि पूरी कायनात में कोई भी हुज़ूर ﷺ की ज़ात-ए-मुबारक के मुशाबह या बराबर नहीं हो सकता। जो लोग हुज़ूर ﷺ से बराबरी का दावा करते हैं उन्हें इस आयत पर संजीदगी से ग़ौर करना चाहिए।
यहाँ लफ़्ज़ 'अगर' किसी शक के लिए नहीं बल्कि हुक्म की अहमियत को उजागर करने के लिए इस्तेमाल हुआ है—जैसे कोई बाप अपने बेटे से कहे कि 'अगर तुम मेरे बेटे हो तो मेरी बात सुनो'। यह इस बात पर ज़ोर देता है कि अगर वे अल्लाह का तक़वा रखती हैं तो निहायत एहतियात से गुफ़्तगू फ़रमाएं।
यहाँ से दो बुनियादी उसूल मालूम होते हैं:
सख़्त ज़रूरत के वक़्त अज़वाज-ए-मुतह्हरात को बद-तरीन काफ़िरों से भी (परदे के पीछे से) बात करने की इजाज़त थी।
तमाम अहले ईमान की 'माँएं' होने के बावजूद, उन्हें परदे के पीछे से ऐसी आवाज़ में बात करने का हुक्म दिया गया जो न बहुत नर्म हो और न शीरीं, ताकि जिन लोगों के दिलों में निफ़ाक़ या शहवत की बीमारी है वे कोई बातिल ख़याल न लाएं। उनका लहजा बा-वक़ार, संजीदा और नज़ाकत से पाक होना चाहिए।
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