Transliteration: (Yaa aiyuhan Nabiyyut taqil laaha wa laa tuti'il kaafireena wal munaafiqeen; innal laaha kaana 'aleeman Hakeemaa)
"ऐ नबी [1] (ग़ैब की ख़बरें देने वाले)! अल्लाह से डरते रहिए [2] और काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की बात न मानिए; बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला, बड़ी हिकमत वाला है।"
इस बा-अज़मत ख़िताब से तीन बुनियादी और अहम अस्बाक़ (सबक़) हासिल होते हैं:
हुज़ूर ﷺ को नाम के बजाय अल्क़ाब से पुकारना अल्लाह तआला की सुन्नत है। दीगर अंबिया-ए-किराम को उनके नामों से पुकारा गया, मगर हमारे प्यारे रसूल ﷺ को बुलन्द अल्क़ाब जैसे “ऐ नबी” से नवाज़ा गया, जो बारगाह-ए-इलाही में आपके मर्तबा-ए-उल्या (आला मुक़ाम) को ज़ाहिर करता है।
हुज़ूर ﷺ के ज़ाती अस्मा-ए-मुबारक मुहम्मद और अहमद हैं, लेकिन आपके बेशुमार मुनव्वर औसाफ़ व अल्क़ाब हैं। इनमें से "नबी" एक सिफ़ाती नाम है जो आपके इलाही तअल्लुक़ और गै़ब की ख़बरें देने के मंसब को उजागर करता है।
ख़िताब का यह मुनफ़रिद अंदाज़ इस बात की खुली दलील है कि हुज़ूर अक़दस ﷺ की ताज़ीम व एहतिराम तमाम अंबिया से बढ़कर है, जो अल्लाह के नज़दीक आपके ला-सानी और अफ़ज़ल मर्तबे को साबित करता है।
हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ अल्लाह के तक़वे और ख़ौफ़ के आला तरीन मक़ाम पर फ़ाइज़ थे।
लिहाज़ा यह हुक्म कोई नया तक़वा हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि इस पर हमेशा साबित-क़दम और दायम रहने के लिए है।
इससे यह उसूल वाज़ेह होता है कि जब कोई शख़्स पहले ही किसी फ़ज़ीलत व कमाल पर हो, तो उसे उस पर क़ायम रहने का हुक्म देना उसकी मज़ीद ताईद और बुलन्दी-ए-दरजात का सबब होता है, न कि किसी इस्लाह के लिए।
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