Transliteration: (Wattabi' maa yoohaaa ilaika mir Rabbik; innal laaha kaana bimaa ta'maloona Khabeera)
"और उसकी पैरवी कीजिए जो आपके रब [3] की तरफ़ से आप पर वह्य की जाती है; बेशक अल्लाह तुम्हारे आमाल से बा-ख़बर है।"
यहाँ रब की तरफ़ से नाज़िल होने वाली हर वह्य की पैरवी करने का हुक्म फ़रमाया गया है:
ख़्वाह वह वह्य-ए-जली (खुली वह्य) हो जैसे कि क़ुरआन-ए-पाक,
या वह्य-ए-ख़फ़ी व इल्हामी हो, जैसे कि हदीस-ए-रसूल ﷺ।
यह आयत मुबारका साबित करती है कि क़ुरआन, हदीस, और नबी-ए-करीम ﷺ की तरफ़ रूहानी व इलाही रहनुमाई की हर सूरत सब अल्लाह तआला ही की तरफ़ से है।
यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब अबू सुफ़ियान, इक्रमा, अबुल अअ़वर असलमी और दूसरे लोग पोशीदा तौर पर मदीना मुनव्वरा आए और मुनाफ़िक़ अब्दुल्लाह बिन उबई के घर ठहरे।
उन्होंने अमान माँगी और हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर होकर गुफ़्तगू की और यह तजवीज़ पेश की:
कि आप उनके बुतों की मज़म्मत (बुराई) न करें,
और यह तस्लीम फ़रमा लें कि ये बुत अपने पूजने वालों की शफ़ाअत (सिफ़ारिश) कर सकते हैं।
इसके बदले उन्होंने दावा किया कि वे अल्लाह के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेंगे।
मुनाफ़िक़ों ने इस तजवीज़ की हिमायत की। हुज़ूर ﷺ इस बात से सख़्त नाख़ुश हुए, और हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें क़त्ल करने का इरादा फ़रमाया। लेकिन हुज़ूर ﷺ ने उन्हें रोक दिया क्योंकि वे अमान तलब करके आए थे।
बाद में हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें मदीना मुनव्वरा से निकाल बाहर किया, और यह आयत नाज़िल हुई—जिसमें सिर्फ़ वह्ये इलाही की पैरवी का हुक्म दिया गया और काफ़िरों व मुनाफ़िक़ों की ख़्वाहिशात पर कान न धरने की ताकीद फ़रमाई गई।
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