Transliteration: (Ud'oohum li aabaaa'ihim huwa aqsatu 'indal laah; fa illam ta'lamooo aabaaa'ahum fa ikhwaanukum fid deeni wa mawaaleekum; wa laisa 'alaikum junaahun feemaaa akhtaatum bihee wa laakim maa ta'ammadat quloobukum; wa kaanal laahu Ghafoorar Raheemaa)
"तुम उन्हें उनके (हक़ीक़ी) बापों के नाम से [8] पुकारो, यह अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा इंसाफ़ की बात है; फिर अगर तुम्हें उनके बापों का इल्म न हो तो वे दीन में तुम्हारे भाई और तुम्हारे दोस्त [9] हैं; और जो भूल-चूक तुमसे अनजाने में [10] हो जाए उसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं, अलबत्ता गुनाह वह है जिसका तुम्हारे दिलों ने क़सद (इरादा) [11] किया हो; और अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, निहायत रहम फ़रमाने वाला है।"
यह आयत नसब के इस्लामी क़ानून को क़ायम फ़रमाती है। बच्चों को उनके हक़ीक़ी (नुत्फ़ा के) बापों के नाम के साथ पुकारा जाना लाज़िम है। इससे यह भी वाज़ेह होता है कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का कोई दुनियावी बाप न था—इसीलिए क़ुरआन में उन्हें हमेशा ईसा इब्ने मरयम कहा गया, किसी मर्द की तरफ़ मंसूब नहीं किया गया। अल्लाह तआला का फ़रमान है: "उन्हें उनके बापों के नाम से पुकारो", जो लेपालक के अल्क़ाब पर हक़ीक़ी नसब की अहमियत को साबित करता है।
अगर किसी के हक़ीक़ी बाप की पहचान मालूम न हो, तो उसे ग़लत तौर पर किसी और की तरफ़ मंसूब नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय इज़्ज़तदार अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किए जाएं जैसे:
"दीनी भाई" (अख़ फ़िद्दीन)
"दोस्त" या "मौला" (जिसका मफ़हूम मौक़े के लिहाज़ से आज़ाद-कर्दा ग़ुलाम, मुहसिन या रफ़ीक़ होता है)
यह तरीक़ा किसी झूठे नसब को गढ़े बग़ैर इंसान की इज़्ज़त व वक़ार की हिफ़ाज़त करता है।
अगर किसी ने शरई हुक्म नाज़िल होने से पहले किसी लेपालक को अपना बेटा कह दिया था, या हुक्म के बाद भी ज़बान की भूल-चूक से ऐसा निकल गया, तो इस पर कोई गुनाह नहीं। यह अल्लाह तआला की रहमत व शफ़क़त की दलील है कि वह ग़ैर-इरादतन ग़लतियों पर अपने बंदों की पकड़ नहीं फ़रमाता, ख़ास तौर पर जब वह हुक्म की आमद से पहले वाक़े हुई हों।
अलबत्ता हुक्मे इलाही नाज़िल हो जाने के बाद, जान-बूझकर किसी को उसके हक़ीक़ी बाप के सिवा किसी और का बेटा कहना गुनाहे कबीरा है। आयत का यह हिस्सा अनजाने की ग़लती और जान-बूझकर की गई नाफ़रमानी के दरमियान फ़र्क़ को वाज़ेह करता है, ताकि लोग अपने क़ौल को हक़ और शरीअत के मुताबिक़ रखें।
ख़ुलासा:
यह आयत इस्लामी मुआशरे का एक बुनियादी उसूल तय करती है—यानी नसब की पाकीज़गी और हिफ़ाज़त और ज़बान से निकलने वाले अल्फ़ाज़ की ज़िम्मेदारी, जिसमें अल्लाह तआला हक़ के मामले में सख़्ती और भूल-चूक पर बेइंतिहा रहम व मफ़िरत फ़रमाने वाला है।
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