कुरान - 33:6 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

6
ٱلنَّبِيُّ أَوۡلَىٰ بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ مِنۡ أَنفُسِهِمۡۖ وَأَزۡوَٰجُهُۥٓ أُمَّهَٰتُهُمۡۗ وَأُوْلُواْ ٱلۡأَرۡحَامِ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلَىٰ بِبَعۡضٖ فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَٱلۡمُهَٰجِرِينَ إِلَّآ أَن تَفۡعَلُوٓاْ إِلَىٰٓ أَوۡلِيَآئِكُم مَّعۡرُوفٗاۚ كَانَ ذَٰلِكَ فِي ٱلۡكِتَٰبِ مَسۡطُورٗا

Transliteration: (An-Nabiyyu awlaa bil mu'mineena min anfusihim wa azwaajuhoo ummahatuhum wa ulul arhaami ba'duhum awlaa biba'din fee Kitaabil laahi minal mu'meneena wal Muhaajireena illaaa an taf'alooo ilaaa awliyaaa'ikum ma'roofaa; kaana zaalika fil kitaabi mastooraa)

नबी मोमिनों की जानों पर उनके अपने नफ़्स से भी ज़्यादा हक़दार [13] हैं, और उनकी पाकीज़ा बीवियाँ उनकी माँएं हैं; और अल्लाह की किताब में रिश्तेदार (मीरास में) एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार [14] हैं ब-निस्बत दूसरे मोमिनों और मुहाजिरीन [15] के, सिवाय इसके कि तुम अपने दोस्तों के साथ कोई भला सुलूक (वसीयत) [16] करना चाहो; यह हुक्म किताब (लौहे महफ़ूज़) में लिखा हुआ [17] है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 6 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 6

"नबी मोमिनों की जानों पर उनके अपने नफ़्स से भी ज़्यादा हक़दार [13] हैं, और उनकी पाकीज़ा बीवियाँ उनकी माँएं हैं; और अल्लाह की किताब में रिश्तेदार (मीरास में) एक-दूसरे के ज़्यादा हक़दार [14] हैं ब-निस्बत दूसरे मोमिनों और मुहाजिरीन [15] के, सिवाय इसके कि तुम अपने दोस्तों के साथ कोई भला सुलूक (वसीयत) [16] करना चाहो; यह हुक्म किताब (लौहे महफ़ूज़) में लिखा हुआ [17] है।"

[13] हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ मोमिनों की जानों से भी ज़्यादा हक़दार हैं

लफ़्ज़ “औला” के मानी ज़्यादा प्यारे, ज़्यादा क़रीब, और ज़्यादा हक़दार के हैं—और यहाँ ये तीनों मानी बिल्कुल दुरुस्त हैं। यह इस हक़ीक़त को दर्शाता है कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ हाज़िर व नाज़िर हैं, अपनी उम्मत के अहवाल को मुलाहिज़ा फ़रमाते हैं और उनकी जानों से भी ज़्यादा उनके क़रीब हैं। इरशाद-ए-बारी तआला है:
"बेशक तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक रसूल तशरीफ़ लाए…" (सूरह अत-तौबा: 128)।
हुज़ूर ﷺ का हुक्म इंसान के माँ-बाप, हाकिम, यहाँ तक कि अपनी ज़ात पर भी मुक़द्दम है, क्योंकि आप ﷺ ही दुनिया और आख़िरत में सबसे बड़ा नफ़ा और भलाई अता फ़रमाने वाले हैं।

इससे यह भी वाज़ेह हुआ कि हुज़ूर ﷺ हमारे भाई नहीं हैं—क्योंकि भाई की बीवियाँ भाभी (बहन जैसी) होती हैं, माँएं नहीं बन सकतीं। बल्कि हुज़ूर ﷺ हमारे रूहानी बाप हैं, और आपकी अज़वाज-ए-मुतह्हरात तमाम अहले ईमान की “उम्महातुल मुअमिनीन” (मोमिनों की माँएं) हैं, ख़्वाह वे अज़वाज-ए-निकाहिया हों या बांदियां। अलबत्ता जिन्हें रुख़सती से पहले जुदा कर दिया गया था, उन्हें यह रूहानी मादरियत का दर्जा हासिल नहीं।

[14] हक़ीक़ी ख़ूनी रिश्तेदारों को मीरास में अव्वलीयत

मीरास और शरई हुक़ूक़ के ऐतबार से ख़ानदान के हक़ीक़ी ख़ूनी रिश्तेदार ही मुक़द्दम हैं। आयत में फ़रमाया गया कि अगरचे ईमान और हिजरत की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है, लेकिन मीरास जैसे क़ानूनी मामलात में वे ख़ून के रिश्तों पर ग़ालिब नहीं आ सकते।

[15] मुवाख़ात (दीनी भाईचारे) की बुनियाद पर मीरास की मंसूख़ी

इस्लाम के इब्तिदाई दौर में हिजरत और दीनी भाईचारे के तअल्लुक़ पर भी मीरास तक़सीम की जाती थी, ख़ास तौर पर मुहाजिरीन और अंसार के दरमियान। इस आयत ने उस हुक्म को मंसूख़ (ख़त्म) कर दिया—अब मीरास सिर्फ़ और सिर्फ़ हक़ीक़ी ख़ूनी रिश्तेदारों के दरमियान जारी होगी, रूहानी क़ुर्बत की बुनियाद पर नहीं।

[16] एहसान व भला सुलूक – वसीयत के ज़रिये

अगर कोई शख़्स अपने किसी ग़ैर-वारिस दोस्त या अज़ीज़ को नफ़ा पहुँचाना चाहे, तो वह अपनी जायदाद के एक-तिहाई (1/3) हिस्से तक वसीयत कर सकता है। इसमें शामिल हो सकते हैं:

  • क़रीबी मुख़लिस साथी

  • दूर के रिश्तेदार

  • आज़ाद-कर्दा ग़ुलाम
    लेकिन असल जायदाद (तरका) सिर्फ़ शरीअत के मुक़र्रर-कर्दा हक़दार वारिसों ही को मिलेगी।

[17] लौहे महफ़ूज़ का दायमी फ़ैसला

मीरास और रिश्तेदारों की तरजीह का यह मुकम्मल क़ानून कोई आरज़ी हुक्म नहीं—बल्कि यह लौहे महफ़ूज़ (इलाही किताब) में हमेशा के लिए लिखा हुआ है। यह एक अटल शरई फ़रीज़ा है, जिसमें कोई इंसानी रद्दोबदल मुम्किन नहीं।

ख़ुलासा:
यह आयत हुज़ूर ﷺ की आला तरीन रूहानी शान, आपकी अज़वाज-ए-मुतह्हरात के अज़ीम वक़ार को साबित करती है, और साथ ही मीरास के शरई उसूलों को ख़ून के रिश्तों पर मब्नी क़रार देकर रूहानी मुक़ाम और क़ानूनी हुदूद के दरमियान एक कामिल तवाज़ुन क़ायम फ़रमाती है।

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