Transliteration: (Maa kaana Muhammmadun abaaa ahadim mir rijaalikum wa laakir Rasoolal laahi wa Khaataman Nabiyyeen; wa kaanal laahu bikulli shai'in 'Aleema (section 5))
"मुहम्मद [110] तुम्हारे मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं [111]। लेकिन वे अल्लाह के रसूल हैं [112], और आख़िरी नबी (ख़ातमुन-नबिय्यीन) हैं। और अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है [113]।"
हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ के एक हज़ार से ज़ायद मुक़द्दस अस्मा हैं, जिनमें मुहम्मद और अहमद आपके ज़ाती नाम हैं। नामे मुबारक मुहम्मद निहायत मुनफ़रिद है—न सिर्फ़ इसलिए कि इसके तमाम हुरूफ़ बे-नुक्ता हैं, बल्कि इसके गहरे रूहानी मफ़ाहिम भी हैं। सामी ज़बान और इल्मे आदाद के ऐतबार से लफ़्ज़ "मुहम्मद" के आदाद 313 बनते हैं, जो कि रसूलों की तादाद और सहाबा-ए-बद्र की तादाद के बिल्कुल मुवाफ़िक़ हैं—जो अंबिया और अहले ईमान के दरमियान आपके अज़ीम मर्तबे का एक लतीफ़ और बा-मअनी इशारा है।
यह आयत काफ़िरों के उस एतिराज़ का दंदान-शिकन जवाब देने के लिए नाज़िल हुई जो उन्होंने हुज़ूर ﷺ के हज़रत ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) से निकाह पर उठाया था, जो आपके लेपालक ज़ैद बिन हारिसा की तलाक़-याफ़्ता बीवी थीं। अरब दस्तूर में लेपालक को सगा बेटा समझा जाता था और उसकी बीवी को बाप के लिए हराम क़रार दिया जाता था। इस वह्ये इलाही ने वाज़ेह फ़रमाया कि मुंह-बोला बेटा बनाने से नसब तब्दील नहीं होता, और हुज़ूर ﷺ तुम्हारे मर्दों में से किसी के हक़ीक़ी बाप नहीं हैं। आपकी अपनी नरसीना (बेटे) औलाद बचपन ही में पर्दा फ़रमा गई थी।
हुज़ूर मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ मदीना के मर्दों में से किसी के जिस्मानी बाप नहीं हैं—लेकिन आप बिला-शुबा अल्लाह के रसूल और आख़िरी नबी (ख़ातमुन-नबिय्यीन) हैं। आप पूरी उम्मत के रूहानी बाप हैं। यह आयत मुबारका दो टूक ऐलान फ़रमाती है कि आपकी नबूवत के साथ तमाम नबियों की आमद का दरवाज़ा हमेशा के लिए बंद हो चुका है।
अहले अरब की रस्म इलाही शरीअत के ख़िलाफ़ थी, चुनांचे इस आयत ने साफ़ फ़रमा दिया कि अल्लाह का हुक्म तमाम रिवायात पर ग़ालिब है। मज़ीद यह कि अक़ीदा-ए-ख़त्मे नबूवत महज़ तारीख़ी या इज्माई बात नहीं, बल्कि अल्लाह तआला का क़तई और मोहकम फ़रमान है। जो कोई हुज़ूर ﷺ के बाद नबूवत का दावा करे या किसी को नबी माने वह खुले कुफ़्र का मुर्तकिब है और इस्लाम के दायरे से ख़ारिज है।
जिस तरह “ला इलाहा इल्लल्लाह” यह ऐलान करता है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं,
उसी तरह “ला नबिय्या बाअदी” यह साबित करता है कि मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के बाद क़यामत तक कोई नबी नहीं आ सकता।
ये दोनों इस्लाम के बुनियादी और लाज़िमी अक़ायद हैं।
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