कुरान - 33:42 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

42
وَسَبِّحُوهُ بُكۡرَةٗ وَأَصِيلًا

Transliteration: (Wa sabbihoohu bukratanw wa aseela)

और सुबह [114] और शाम उसकी पाकी बयान [115] करो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 42 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 42

"और सुबह [114] और शाम उसकी पाकी बयान करो [115]।"

[114] सुबह व शाम तस्बीह-ए-इलाही की फ़ज़ीलत

यह आयत अल्लाह तआला की मुसलसल पाकीज़गी और तस्बीह बयान करने की तरग़ीब देती है, ख़ास तौर पर सुबह और शाम के औक़ात में। ये वे ख़ास लम्हात हैं जब दिन और रात के फ़रिश्ते तब्दील होते हैं, चुनांचे इन औक़ात में अल्लाह का ज़िक्र करना बेपनाह फ़ज़ीलत रखता है। यह हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के मुबारक मामूल की तरफ़ भी इशारा करता है, जो हर लम्हा अल्लाह के ज़िक्र में मुस्तग़रक़ रहते थे और उम्मत के लिए अमली नमूना क़ायम फ़रमाया।

[115] आयत से हासिल होने वाले अस्बाक़

  1. तमाम सहाबा-ए-किराम, और बिलख़ुसूस हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) अज़ीम रूहानी मुक़ाम के हामिल हैं क्योंकि ख़ुद अल्लाह तआला उन पर रहमतें नाज़िल फ़रमाता है—जो बारगाह-ए-इलाही में उनके इज़्ज़त व वक़ार की खुली दलील है।

  2. न सिर्फ़ हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ पर बल्कि आपकी पाकीज़ा आल (औलाद) और सहाबा-ए-किराम पर भी दुरूद व सलाम भेजना जाइज़ और बा-बाएस़-ए-बरकत है, जिसमें हुज़ूर ﷺ के मुबारक वसीले से उन पर भी रहमत तलब की जाती है।

यह आयत निहायत लताफ़त के साथ रोज़ाना के ज़िक्र की अहमियत और उन लोगों के बुलंद मर्तबे को उजागर करती है जो अल्लाह और उसके प्यारे रसूल ﷺ से वाबस्ता रहते हैं।

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