Transliteration: (Huwal lazee yusallee 'alaikum wa malaaa'ikatuhoo liyukhrijakum minazzulumaati ilan-noor wa kaana bilmu'mineena Raheemaa)
"वही है जो तुम पर रहमत भेजता है, और उसके फ़रिश्ते भी, ताकि वह तुम्हें अंधेरों से निकाल कर रौशनी की तरफ़ ले आए [116]। और वह मोमिनों पर निहायत रहम फ़रमाने वाला है।"
जब यह मुबारक आयत नाज़िल हुई, तो हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने आजिज़ी से अर्ज़ किया: “क्या अल्लाह तआला ने वाकई हम पर इतना अज़ीम एहसान फ़रमाया है? क्या वह आपके वसीले से हम गुलामों पर भी रहमतें नाज़िल फ़रमाता है, ऐ अल्लाह के रसूल?” इसके जवाब में यह आयत नाज़िल हुई, जिसने तस्दीक़ फ़रमाई कि बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते मोमिनीन पर सलात (रहमत व दुआ) भेजते हैं, ख़ास तौर पर हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के मुबारक तअल्लुक़ की बदौलत। (ख़ज़ाइनुल इरफ़ान)
यह आयत इस बात का भी खुला सुबूत है कि जो लोग सहाबा-ए-किराम की तन्क़ीस (बुराई) करते हैं या उन्हें गुमराह समझते हैं, वे इस क़ुरानी आयत की सच्चाई का इंकार करते हैं, क्योंकि ख़ुद अल्लाह तआला ने मोमिनीन और बिलख़ुसूस सहाबा-ए-किराम के लिए रहमत और इज़्ज़त का ऐलान फ़रमाया है, जिन्हें उसने कुफ़्र व जिहालत की तारीकियों से निकाल कर ईमान व हिदायत के नूर की तरफ़ रहनुमाई फ़रमाई।
यूँ यह आयत सहाबा-ए-किराम के आला तरीन मुक़ाम, इलाही रहमत की अज़मत, और हुज़ूर ﷺ के वसीले से हासिल होने वाले रूहानी इंक़िलाब को साबित करती है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat