कुरान - 33:45 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

45
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ إِنَّآ أَرۡسَلۡنَٰكَ شَٰهِدٗا وَمُبَشِّرٗا وَنَذِيرٗا

Transliteration: (Yaaa aiyuhan Nabiyyu innaaa arsalnaaka shaahidanw wa mubashshiranw wa nazeeraa)

ऐ ग़ैब की ख़बरें देने वाले नबी! बेशक हमने आपको गवाह (हाज़िर व नाज़िर) और ख़ुशख़बरी देने वाला [118] और डर सुनाने वाला [119] बनाकर भेजा है; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 45 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 45

"ऐ अल्लाह के नबी (ग़ैब की ख़बरें देने वाले)! बेशक हमने आपको गवाह और ख़ुशख़बरी सुनाने वाला [118] और डर सुनाने वाला [119] बनाकर भेजा है। (कन्ज़ुल ईमान)"

[118] 'शाहिद' (गवाह / हाज़िर व नाज़िर) का अज़ीम मफ़हूम

लफ़्ज़ शाहिद (गवाह) मुशाहदा से निकला है—यानी मौजूद रहकर अपनी आँखों और बसीरत से मुलाहिज़ा फ़रमाना। इस मुक़द्दस लफ़्ज़ के कई गहरे मफ़ाहिम हैं:

  • हुज़ूर ﷺ अल्लाह की तौहीद के गवाह हैं, जिन्हें दोनों जहाँ पर निगरानी फ़रमाने वाला गवाह बनाकर भेजा गया।

  • आपका इल्म और रूहानी नूर हर जगह और हर वक़्त मुहीत है, बिल्कुल उसी तरह जैसे सूरज की रौशनी पूरी ज़मीन को मुनव्वर करती है।

  • आप तमाम इंसानों पर गवाह हैं, मोमिनों पर भी और काफ़िरों पर भी, और क़यामत के दिन उनके आमाल की गवाही फ़रमाएंगे।

  • दुनिया ही में आपने वह्य के ज़रिये जन्नती और दोज़ख़ी लोगों की पहचान करा दी—जैसे हज़रत अबू बक्र का जन्नती होना, या हज़रत हसन व हुसैन का जन्नती जवानों के सरदार होना।

उलमा फ़रमाते हैं कि इसका एक मफ़हूम यह भी है कि हुज़ूर ﷺ मोमिनीन के दिलों में हाज़िर व नाज़िर हैं, और पूरी कायनात के महबूब-ए-दायमी हैं। आपकी मोहब्बत ने बे-जान अशिया को भी बे-क़रार कर दिया—दरख़्तों, ऊंटों और पत्थरों ने आपके हिज्र में आंसू बहाए। आज भी करोड़ों आशिक़ान बग़ैर देखे आपसे बेपनाह मोहब्बत करते हैं।

[119] बशारत और इंदार – मन्सबे रिसालत

तमाम अंबिया इस इलाही मंसब में शरीक थे: अल्लाह की रहमत की ख़ुशख़बरी (बशारत) देना, और उसके अज़ाब से डराना (इंदार)।

लेकिन जो चीज़ हुज़ूर मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को सबसे मुमताज़ करती है वह यह है कि आपने जन्नत और दोज़ख़ को अपनी मुबारक आँखों से मुलाहिज़ा फ़रमाया, और ऐनुल यक़ीन के साथ उनकी गवाही दी।

आपकी गवाही आख़िरी और कामिल है—उसे किसी दूसरी सनद की ज़रूरत नहीं। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: “आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया” (सूरह अल-माइदा: 3)।

आपकी मुबारक मौजूदगी में किसी दूसरे मुद्दई-ए-नबूवत की कोई ज़रूरत बाक़ी नहीं रहती। जिस तरह सूरज की रौशनी में चिराग़ की ज़रूरत नहीं होती, उसी तरह हुज़ूर ﷺ की कामिल और मुकम्मल नबूवत ने मिर्ज़ा क़ादियानी जैसे झूठे दावेदारों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी।

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