कुरान - 33:52 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
لَّا يَحِلُّ لَكَ ٱلنِّسَآءُ مِنۢ بَعۡدُ وَلَآ أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنۡ أَزۡوَٰجٖ وَلَوۡ أَعۡجَبَكَ حُسۡنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتۡ يَمِينُكَۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ رَّقِيبٗا

Transliteration: (Laa yahillu lakan nisaaa'u mim ba'du wa laaa an tabaddala bihinna min azwaajinw wa law ajabaka husnuhunna illaa maa malakat yameenukk; wa kaanal laahu 'alaa kulli shai'ir Raqeeba (section 6))

इसके बाद आपके लिए दूसरी औरतें हलाल नहीं हैं [144], और न यह (हलाल है) कि आप उनके बदले दूसरी बीवियाँ लाएं [145], अगरचे उनका हुस्न आपको भाए, सिवाय उस लौंडी के जो आपकी मिल्कियत में आ जाए [146]; और अल्लाह हर चीज़ पर निगहबान है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 52

"इसके बाद आपके लिए दूसरी औरतें हलाल नहीं हैं, और न यह (हलाल है) कि आप उनके बदले दूसरी बीवियाँ लाएं, अगरचे उनका हुस्न आपको भाए, सिवाय उस लौंडी के जो आपकी मिल्कियत में आ जाए; और अल्लाह हर चीज़ पर निगहबान है।"
(कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा)

हुज़ूर ﷺ के निकाह की ह़दबंदी – [144]

यह आयत-ए-मुबारका एक ख़ास मुक़ाम पर हुज़ूर ﷺ के लिए मज़ीद नए निकाहों की मुमानअत बयान फ़रमाती है।
जब आपकी नौ अज़वाज-ए-मुतह्हरात ने तख़्यीर (दुनिया या आख़िरत चुनने) के वक़्त अल्लाह और उसके रसूल को चुन लिया, तो आप पर पाबंदी फ़रमा दी गई कि:

  • आप मज़ीद औरतों से निकाह न फ़रमाएं,

  • और न इनमें से किसी को तलाक़ देकर उनकी जगह किसी दूसरी औरत से निकाह करें, ख़्वाह उसका हुस्न कितना ही मुतास्सिर क्यों न करे।

उलमा-ए-किराम फ़रमाते हैं कि यह पाबंदी हुज़ूर ﷺ के मख़सूस शरई अहकाम (ख़साइल) में से थी।
आम मुसलमानों के लिए एक वक़्त में चार बीवियों की हद है, जबकि हुज़ूर ﷺ के लिए यह तादाद नौ पर मुअय्यन फ़रमा दी गई, जो हिकमत और रूहानी तक़ाज़ों के तहत थी।

बीवियों के तबादले की मुमानअत – [145]

हुज़ूर ﷺ के लिए यह भी जायज़ न रहा कि आप मौजूदा बीवियों के बदले दूसरी बीवियाँ लाएं।
यह हुक्म उन अज़ीम ख़वातीन के एज़ाज़ व तकरीम के लिए था जिन्होंने:

  • अल्लाह और उसके रसूल के रास्ते को इख़्तियार किया,

  • और नुबुव्वत के घर की सादगी और क़ुरबानियों को ब-ख़ुशी गले लगाया।

अगरचे बाद में सूरह अल-अहज़ाब की आयत 50 के ज़रिए इस पाबंदी में वुसअत अता फ़रमा दी गई थी, मगर हुज़ूर ﷺ ने अपनी आज़िज़ाना हिकमत के तहत इसके बाद कोई नया निकाह नहीं फ़रमाया।

लौंडियों की इस्तिस्ना (छूट) – [146]

सिर्फ़ इस बात की इजाज़त बाक़ी रखी गई कि जो लौंडी अल्लाह तआला माले ग़नीमत के ज़रिए आपकी मिल्कियत में अता फ़रमाए।
यह सूरत रस्मी निकाह में शुमार नहीं होती थी, इसलिए निकाह की पाबंदी के तहत नहीं आती थी।

इसकी मिसाल हज़रत मारिया क़िब्तिया (रज़ियल्लाहु अन्हा) हैं, जो इसी तरह हुज़ूर ﷺ के काशाना-ए-अक़दस में दाख़िल हुईं।
उनसे हुज़ूर ﷺ के साहबज़ादे हज़रत इब्राहीम पैदा हुए, जिनका बचपन ही में विसाल हो गया।

इस हुक्म से यह भी ज़ाहिर होता है कि:

  • किसी ग़ैर-मुस्लिम औरत (जैसे यहूदिया या नस्रानिया) को हुज़ूर ﷺ की रस्मी बीवी नहीं बनाया जाना था, ताकि “उम्महातुल मोमिनीन” के मुक़द्दस लक़ब का वक़ार क़ायम रहे,

  • लेकिन अगर वह कनीज़ (लौंडी) की हैसियत से आए, तो यह पाबंदी आयद नहीं होती थी।

हर चीज़ पर अल्लाह की निगहबानी

आयत का इख़्तिताम एक अज़ीम हक़ीक़त पर होता है:
अल्लाह हर अमल, हर नीयत और हर नतीजे पर पूरी तरह निगहबान है।
यह इलाही निगहबानी इस बात की ज़ामिन है कि हुज़ूर ﷺ के अहले बैत और उनके निकाह के तमाम अहकाम हिकमत-ए-इलाही के कामिल निज़ाम के तहत हैं।

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