Transliteration: (Yaaa aiyuhan Nabiyyu innaaa ahlalnaa laka azwaa jakal laatee aataiyta ujoora hunna wa maa malakat yameenuka mimmaaa afaaa'al laahu 'alaika wa banaati 'ammika wa banaati 'ammaatika wa banaati khaalika wa banaati khaalaa tikal laatee haajarna ma'aka wamra' atan mu'minatan inw wahabat nafsahaa lin Nabiyyi in araadan Nabiyyu ai yastan kihahaa khaalisatan laka min doonil mu'mineen; qad 'alimnaa maa faradnaa 'alaihim feee azwaajihim wa maa malakat aimaanuhum li kailaa yakoona 'alaika haraj; wa kaanal laahu Ghafoorar Raheema)
"ऐ नबी (ग़ैब की ख़बरें देने वाले)! बेशक हमने आपके लिए आपकी वे बीवियाँ हलाल फ़रमा दी हैं जिनके महर आपने अदा कर दिए हैं, और वे औरतें जो आपकी मिल्कियत में आईं उनमें से जिन्हें अल्लाह ने ग़नीमत में आपको अता फ़रमाया; और आपके चचा की बेटियाँ, और आपकी फूफियों की बेटियाँ, और आपके मामूओं की बेटियाँ, और आपकी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने आपके साथ हिजरत की है; और वह मोमिन औरत, अगर वह अपनी जान नबी को हिबा कर दे और नबी उसे निकाह में लाना चाहें। यह ख़ास आपके लिए है, मोमिनों के सिवा। हमें मालूम है जो कुछ हमने मोमिनों पर उनकी बीवियों और उनकी लौंडियों के बारे में मुक़र्रर किया है, ताकि आप पर कोई तंगी न रहे। और अल्लाह बख़्शने वाला, बड़ा मेहरबान है।"
(कन्ज़ुल ईमान तर्जुमा)
यह आयत-ए-मुबारका हुज़ूर नबी-ए-अकरम ﷺ के लिए अता की गई ख़ास निकाह की छूट और सहूलियात को बयान करती है, और आग़ाज़ में इन सूरतों के हलाल होने की तस्दीक़ फ़रमाती है:
आपकी वे अज़वाज-ए-मुतह्हरात जिनके महर आपने अदा फ़रमा दिए हैं।
वे लौंडियाँ जो अल्लाह ने आपको माले ग़नीमत (जंग के क़ैदियों) के ज़रिए अता फ़रमाईं, जिनकी हैसियत उस ज़माने की शरीअत में मुसल्लमा थी।
ये तमाम इजाज़तें उस दौर के अख़लाक़ी और सामाजी तक़ाज़ों की आईनादार थीं, जो अल्लाह के हुक्म के तहत जारी हुईं।
हलाल की गई सूरतों में हुज़ूर ﷺ के कुनबे की वे ख़वातीन भी शामिल हैं, बशर्ते कि उन्होंने:
आपके साथ मदीना मुनव्वरा की तरफ़ हिजरत की हो (जो इस्लाम में उनके ख़ुलूस की अलामत थी)।
ये हैं:
चचाओं और फूफियों की बेटियाँ, और
मामूओं और ख़ालाओं की बेटियाँ।
यहाँ हिजरत की शर्त ऐसे निकाह की शरई पाकीज़गी के लिए एक रूहानी वफादारी और अहद का दर्जा रखती है।
एक मुन्फ़रिद शरई रिआयत यह अता की गई:
कोई मोमिन औरत अपने नफ़्स को बग़ैर महर के हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में निकाह के लिए हिबा (पेश) कर दे,
और अगर आप उसे कबूल फ़रमा लें, तो यह निकाह रज़ा-ए-इलाही से शरअन मुकम्मल और हलाल हो जाता।
यह हुक्म सिर्फ़ आपकी ज़ात-ए-मुक़द्दसा के लिए मख़सूस था, जो आपके ख़ास मर्तबा-ए-नुबुव्वत और आपके बुलंद अख़लाक़ी एतमाद की अलामत है।
ये मख़सूस सहूलतें सिर्फ़ हुज़ूर नबी-ए-पाक ﷺ के लिए थीं, और आम मोमिन मर्दों के लिए यह हुक्म नहीं था।
क्यों? क्योंकि:
“हमें मालूम है जो कुछ हमने मोमिनों पर मुक़र्रर किया है” – यानी अल्लाह तआला ने आम मोमिनों के लिए पहले ही शरई हुदूद मुक़र्रर फ़रमा दी हैं:
बीवियों की तादाद (अधिकतम चार),
लौंडियों से निकाह की शराइत,
चचेरी, फुफेरी, ममेरी, ख़ालेरा बहनों से आम निकाह के अहकाम।
मगर हुज़ूर ﷺ के लिए इन पाबंदियों को आसान फ़रमा दिया गया ताकि:
इलाही ज़िम्मेदारियों और तब्लीग़ के काम को ब-आसानी अंजाम दिया जा सके,
और इस्लामी रियासत के सियासी, सामाजी और दीनी मक़ासिद को मुकम्मल हिकमत के साथ पूरा किया जा सके।
ये ख़ास इख़्तियारात किसी नफ़्सानी ख़्वाहिश के तहत नहीं, बल्कि इसलिए अता किए गए ताकि हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस मक़ासिद में कोई तंगी या हरज वाक़े न हो, ख़ास तौर पर:
बढ़ती हुई उम्मत की रूहानी व तालीमी ज़रूरतों को पूरा करना,
क़बीलों के साथ सफ़ारती और सामाजी ताल्लुक़ात को मज़बूत करना,
और नौख़ेज़ इस्लामी मुआशरे के ढांचे को मुस्तहकम करना।
आख़िर में अल्लाह तआला ने इस आयत का इख़्तिताम फ़रमाया:
“और अल्लाह बख़्शने वाला, बड़ा मेहरबान है”
जो उसकी अज़ीम रहमत और इन अहकाम की पाकीज़ा हिकमत को ज़ाहिर फ़रमाता है, जो ख़ास तौर पर हुज़ूर ﷺ की आसानी और इज़्ज़त व तकरीम के लिए नाज़िल किए गए।
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