Transliteration: (Wa laa tuti'il kaafireena walmunaafiqeena wa da'azaahum wa tawakkal 'alallaah; wa kafaa billaahi Wakeelaa)
"और काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की बात न मानिए, और उनकी ईज़ा-रसानी से दरगुज़र कीजिए [123], और अल्लाह पर भरोसा रखिए; और अल्लाह काम बनाने के लिए काफ़ी है।"
इस आयत में हुज़ूर ﷺ को हुक्म दिया गया कि किसी भी मामले में काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की ख़्वाहिशात या मशवरे पर तवज्जोह न फ़रमाएं। उनके एतराज़ात और मुतालबात कुफ़्र और फ़रेब पर मबनी हैं, और इलाही अहकाम के मुक़ाबले में उनकी कोई हैसियत नहीं।
आपको यह भी ताकीद की गई कि उनकी ईज़ा-रसानी—ज़बानी तानों, झूठे इल्ज़ामात और मज़ाक़ उड़ाने—को उस वक़्त तक नज़रअंदाज़ फ़रमाएं जब तक कि जिहाद का क़तई हुक्म नाज़िल न हो जाए।
जब खुले काफ़िरों के ख़िलाफ़ जिहाद का हुक्म नाज़िल हुआ, तो हुज़ूर ﷺ ने उनके ख़िलाफ़ तलवार से मुक़ाबला फ़रमाया।
मगर मुनाफ़िक़ों के ख़िलाफ़ यह जंग ज़बानी और हिकमत के साथ रही—उनके निफ़ाक़ को बेनक़ाब करके, रुसवा करके और उनके बातिल दलाइल को झुठलाकर।
आयत का इख़्तिताम इस ज़बरदस्त ताकीद पर होता है:
अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा रखिए, क्योंकि वही अकेला हर काम को संवारने और हिफ़ाज़त फ़रमाने के लिए काफ़ी है।
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