कुरान - 33:49 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

49
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا نَكَحۡتُمُ ٱلۡمُؤۡمِنَٰتِ ثُمَّ طَلَّقۡتُمُوهُنَّ مِن قَبۡلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمۡ عَلَيۡهِنَّ مِنۡ عِدَّةٖ تَعۡتَدُّونَهَاۖ فَمَتِّعُوهُنَّ وَسَرِّحُوهُنَّ سَرَاحٗا جَمِيلٗا

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo izaa nakahtumul mu'minaati summa tallaqtu moohunna min qabli an tamas soohunna famaa lakum 'alaihinna min 'iddatin ta'taddoonahaa famatti'oohunna wa sarri hoohunna saraahan jameelaa)

ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो [124] फिर उन्हें हाथ लगाने (सोहबत करने) से पहले [125] तलाक़ दे दो, तो तुम्हारे लिए उन पर कोई इद्दत का हक़ नहीं जिसे तुम शुमार करो; पस उन्हें कुछ नफ़ा (सामान) अता करो [126] और उन्हें अच्छी तरह भलाई के साथ रुख़सत करो [127]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 49 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 49

"ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो [124] फिर उन्हें हाथ लगाने से पहले [125] तलाक़ दे दो, तो तुम्हारे लिए उन पर कोई इद्दत का हक़ नहीं जिसे तुम शुमार करो; पस उन्हें कुछ नफ़ा अता करो [126] और उन्हें अच्छी तरह भलाई के साथ रुख़सत करो [127]।"

[124] मोमिन औरतों से निकाह की फ़ज़ीलत

इस आयत का आग़ाज़ अहले ईमान को ख़िताब करके किया गया है और इसमें मुसलमान औरतों से निकाह करने की फ़ज़ीलत व तर्जीह बयान की गई है।
अगरचे अहले किताब की औरतों से भी निकाह शरअन जायज़ है, मगर मोमिन औरतों से निकाह करना अफ़ज़ल और मुस्तहसन है, जैसा कि ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में ज़िक्र किया गया है।

[125] सोहबत से पहले तलाक़ पर इद्दत की नफ़ी

अगर कोई मर्द अपनी बीवी को हाथ लगाने (ख़लवत-ए-सहीहा या सोहबत) से पहले तलाक़ दे दे, तो औरत पर कोई इद्दत (मुद्दत-ए-इंतज़ार) लाज़िम नहीं होती।
लेकिन अगर निकाह के बाद सोहबत से पहले शौहर का इंतिक़ाल हो जाए, तो औरत पर इद्दत-ए-वफ़ात लाज़िम होगी। इससे मालूम हुआ कि इद्दत शौहर के हक़ से जुड़ी है, ख़्वाह जिस्मानी ताल्लुक़ हुआ हो या न हुआ हो।
और जिन सूरतों में मुद्दत तक सोहबत न रही हो मगर निकाह मुकम्मल था, तो तलाक़ के बाद औरत पर इद्दत वाजिब होती है।

[126] रुख़सती का तोहफ़ा (मताअ) पेश करना

अगर निकाह के वक़्त महर मुक़र्रर था मगर सोहबत नहीं हुई, तो शौहर पर आधा महर लाज़िम होता है और औरत को जोड़ा (कपड़े) या रुख़सती का तोहफ़ा देना हुस्न-ए-सुलूक और ज़िम्मेदारी का इज़हार है।
और अगर महर मुअय्यन नहीं था, तो मताअ (तोहफ़ा-ए-रुख़सत) देना मुस्तहब व पसंदीदा है (ख़ज़ाइन)।

[127] इज़्ज़त व एहसान के साथ रुख़सत करना

तलाक़ के मामले को निहायत शाइस्तगी और भलाई के साथ अंजाम दिया जाए। जब औरत पर इद्दत नहीं है, तो उस पर किसी क़िस्म की पाबंदी न लगाई जाए।
उसे आज़ादी दी जाए कि वह अपनी मर्ज़ी से आगे बढ़े और दूसरा निकाह कर सके। उसके तमाम बक़ाया हुक़ूक़ अदा किए जाएं और उसकी रुख़सती वक़ार और इज़्ज़त के साथ हो, जो इस्लामी अख़लाक़ का बेहतरीन नमूना है।

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