Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanooo izaa nakahtumul mu'minaati summa tallaqtu moohunna min qabli an tamas soohunna famaa lakum 'alaihinna min 'iddatin ta'taddoonahaa famatti'oohunna wa sarri hoohunna saraahan jameelaa)
"ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो [124] फिर उन्हें हाथ लगाने से पहले [125] तलाक़ दे दो, तो तुम्हारे लिए उन पर कोई इद्दत का हक़ नहीं जिसे तुम शुमार करो; पस उन्हें कुछ नफ़ा अता करो [126] और उन्हें अच्छी तरह भलाई के साथ रुख़सत करो [127]।"
इस आयत का आग़ाज़ अहले ईमान को ख़िताब करके किया गया है और इसमें मुसलमान औरतों से निकाह करने की फ़ज़ीलत व तर्जीह बयान की गई है।
अगरचे अहले किताब की औरतों से भी निकाह शरअन जायज़ है, मगर मोमिन औरतों से निकाह करना अफ़ज़ल और मुस्तहसन है, जैसा कि ख़ज़ाइनुल इरफ़ान में ज़िक्र किया गया है।
अगर कोई मर्द अपनी बीवी को हाथ लगाने (ख़लवत-ए-सहीहा या सोहबत) से पहले तलाक़ दे दे, तो औरत पर कोई इद्दत (मुद्दत-ए-इंतज़ार) लाज़िम नहीं होती।
लेकिन अगर निकाह के बाद सोहबत से पहले शौहर का इंतिक़ाल हो जाए, तो औरत पर इद्दत-ए-वफ़ात लाज़िम होगी। इससे मालूम हुआ कि इद्दत शौहर के हक़ से जुड़ी है, ख़्वाह जिस्मानी ताल्लुक़ हुआ हो या न हुआ हो।
और जिन सूरतों में मुद्दत तक सोहबत न रही हो मगर निकाह मुकम्मल था, तो तलाक़ के बाद औरत पर इद्दत वाजिब होती है।
अगर निकाह के वक़्त महर मुक़र्रर था मगर सोहबत नहीं हुई, तो शौहर पर आधा महर लाज़िम होता है और औरत को जोड़ा (कपड़े) या रुख़सती का तोहफ़ा देना हुस्न-ए-सुलूक और ज़िम्मेदारी का इज़हार है।
और अगर महर मुअय्यन नहीं था, तो मताअ (तोहफ़ा-ए-रुख़सत) देना मुस्तहब व पसंदीदा है (ख़ज़ाइन)।
तलाक़ के मामले को निहायत शाइस्तगी और भलाई के साथ अंजाम दिया जाए। जब औरत पर इद्दत नहीं है, तो उस पर किसी क़िस्म की पाबंदी न लगाई जाए।
उसे आज़ादी दी जाए कि वह अपनी मर्ज़ी से आगे बढ़े और दूसरा निकाह कर सके। उसके तमाम बक़ाया हुक़ूक़ अदा किए जाएं और उसकी रुख़सती वक़ार और इज़्ज़त के साथ हो, जो इस्लामी अख़लाक़ का बेहतरीन नमूना है।
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