Transliteration: (Innal laaha wa malaaa'i katahoo yusalloona 'alan Nabiyy; yaaa aiyuhal lazeena aamanoo salloo 'alaihi wa sallimoo tasleemaa)
"बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद भेजो और ख़ूब सलाम अर्ज़ करो।" [33:56]
यह आयत-ए-मुबारका हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की उस लाज़वाल अज़मत और बेमिसाल शर्फ़ को ज़ाहिर करती है जो कायनात में किसी दूसरी हस्ती को हासिल नहीं: ख़ुद अल्लाह तआला और तमाम फ़रिश्ते मुसलसल आप पर दुरूद व सलात (रहमतें) भेजते हैं। यह ऐसा मुक़द्दस एज़ाज़ है जिसमें कोई मख़लूक़ शरीक नहीं। इसलिए अहले ईमान को हुक्म दिया गया कि वे भी दुरूद भेजें—हुज़ूर ﷺ की ज़रूरत की वजह से नहीं, बल्कि अपनी रूहानी तरक़्क़ी और निजात के लिए।
दुरूद शरीफ़ पढ़ने का हुक्म तमाम अहकाम से अफ़ज़ल व आला है, क्योंकि यह वाहिद इबादत है जिसमें अल्लाह तआला, फ़रिश्ते और तमाम अहले ईमान सब शरीक हैं।
हर दर्जे के फ़रिश्ते मुसलसल और हर लम्हा हुज़ूर ﷺ की बारगाह में दुरूद व सलाम का नज़राना पेश करते रहते हैं।
कायनात की तख़्लीक़ से पहले ही से अल्लाह तआला की रहमतें आप पर नाज़िल हो रही हैं। हमारा दुरूद पढ़ना दरअसल हुज़ूर ﷺ के वसीले से अपने लिए अल्लाह की रहमत हासिल करने का ज़रिया है।
हुज़ूर नबी-ए-पाक ﷺ हयात-उन-नबी हैं और अपनी उम्मत के दुरूद व सलाम को सुनते और जानते हैं। हदीस शरीफ़ के मुताबिक़ जो शख़्स मुहब्बत और खुलूस से सलाम अर्ज़ करता है, आप उसका ख़ुद जवाब अता फ़रमाते हैं।
ईमान वालों को हुज़ूर ﷺ पर सलात (दुरूद) और सलाम (तहिय्यत) दोनों भेजने का पाबंद किया गया है:
ज़िंदगी में एक मर्तबा दुरूद शरीफ़ पढ़ना फ़र्ज़ है।
हर उस महफ़िल में जहाँ आपका नाम-ए-मुबारक लिया जाए, कम से कम एक मर्तबा दुरूद पढ़ना वाजिब है।
नमाज़ के अंदर अत्तहिय्यात के बाद दुरूद पढ़ना सुन्नत है, जबकि नमाज़ के बाहर हर वक़्त दुरूद पढ़ना मुस्तहब और अज़ीम बाइसे सवाब है।
कामिल दुरूद वह है जिसमें सलात और सलाम दोनों जमा हों। अगरचे नमाज़ में पढ़ा जाने वाला दुरूदे इब्राहीमी सिर्फ़ सलात पर मुश्तमिल है, मगर वह इसलिए मुकम्मल है क्योंकि सलाम तशह्हुद में पहले ही पढ़ा जा चुका होता है। अलबत्ता नमाज़ के बाहर ऐसा दुरूद पढ़ना चाहिए जिसमें सलात और सलाम दोनों शामिल हों ताकि हुक्म की मुकम्मल पैरवी हो।
यह आयत हुज़ूर ﷺ के बुलंद तरीन मक़ाम की सनद है, जो तमाम अंबिया से आला है, और ईमान वालों का अपने आक़ा ﷺ के साथ दाइमी रूहानी राब्ता क़ायम करती है।
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