Transliteration: (Wallazeena yu'zoonal mu'mineena wal mu'minaati bighairi mak tasaboo faqadih tamaloo buhtaananw wa ismam mubeenaa (section 7))
"और जो लोग मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों को बग़ैर किसी जुर्म के जो उन्होंने किया हो तकलीफ़ पहुंचाते हैं [171], उन्होंने यक़ीनन बोहतान और खुला गुनाह [172] अपने सर ले लिया।"
यह आयत-ए-मुबारका उन मुनाफ़िक़ों के बारे में नाज़िल हुई जो हज़रत अली अल-मुर्तज़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) को तकलीफ़ पहुंचाते थे। मुफ़स्सिरीन फ़रमाते हैं कि किसी भी इंसान—ख़ास तौर पर मोमिन—को, यहाँ तक कि जानवरों को भी नाहक़ सताना हराम है।
जो लोग हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की आल और औलाद को ईज़ा पहुंचाते हैं, वे सख़्त तरीन मुजरिम हैं क्योंकि अहले बैत का मर्तबा बेहद बुलंद और मुअज़्ज़म है।
इस आयत-ए-करीमा से दो बुनियादी शरई अहकाम वाज़ेह होते हैं:
मोमिन को तकलीफ़ देना बाज़ सूरतों में जायज़ हो सकता है (जैसे शरई हद या हक़्क़ुल इबाद के तहत सज़ा देना), मगर जब बग़ैर किसी जुर्म के सताया जाए तो यह सख़्त गुनाह है। लेकिन जहाँ तक हुज़ूर ﷺ की ज़ात-ए-मुक़द्दसा का ताल्लुक़ है, आपको तकलीफ़ पहुंचाना हर हाल में हराम और कुफ़्र है। आयत में "बग़ैर कुछ किए" की क़ैद इस पाबंदी को साफ़ ज़ाहिर करती है।
बग़ैर वजह मोमिन को सताना एक कबीरा गुनाह (फ़िस्क़) है मगर कुफ़्र नहीं। इसके बरअक्स अल्लाह के नबी को ईज़ा पहुंचाना सरीह कुफ़्र है। यही वजह है कि मोमिनों को सताने पर बोहतान और खुला गुनाह फ़रमाया गया, जबकि पिछली आयत (57) में अल्लाह और उसके रसूल को ईज़ा देने वालों पर लानत और ज़लील करने वाले अज़ाब की सख़्त वईद फ़रमाई गई।
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