Transliteration: (Yaaa aiyuhan Nabiyyu qul li azwaajika wa banaatika wa nisaaa'il mu'mineena yudneena 'alaihinna min jalaabee bihinn; zaalika adnaaa ai yu'rafna falaa yu'zain; wa kaanal laahu Ghafoorar Raheemaa)
"ऐ नबी! अपनी बीवियों [173] और अपनी बेटियों [174] और मुसलमान औरतों से कह दीजिए कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का एक हिस्सा लटकाए रखें (चेहरा छुपाएं) [175]। यह इससे ज़्यादा क़रीब है कि वे पहचानी जाएं [176] तो उन्हें कोई तकलीफ़ न दी जाए [177]; और अल्लाह बख़्शने वाला, बड़ा मेहरबान है।"
इस आयत में लफ़्ज़ बनातिका (अपनी बेटियों) जमा के तौर पर आया है, जिससे साबित होता है कि हुज़ूर ﷺ की एक से ज़ायद बेटियाँ थीं। अगर सिर्फ़ हज़रत फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ही वाहिद बेटी होतीं तो जमा का सेग़ा इस्तेमाल न फ़रमाया जाता।
इससे यह भी मालूम हुआ कि परदा (हिजाब) हुज़ूर ﷺ की अज़वाज और बेटियों पर भी वाजिब था, बावजूद इसके कि वे पाकीज़गी और तहारत के आला तरीन मक़ाम पर फ़ाइज़ थीं। यह परदे की अज़मत व अहमियत का वाज़ेह सुबूत है।
परदा जन्नत की नेमतों में से है—अल्लाह तआला ने फ़रमाया, “वहाँ ख़ैमों में परदा नशीन हूरें हैं” (55:72)। जन्नत में जहाँ कोई बद-निगाही नहीं होगी, वहाँ भी परदा मौजूद रहेगा। इसके बरअक्स बे-परदगी दोज़ख़ की अलामत है जहाँ औरत और मर्द एक-दूसरे के सामने बे-लिबास होंगे।
हुज़ूर ﷺ की कुल आठ साहबज़ादियां थीं। चार आपकी अपनी हक़ीक़ी बेटियाँ थीं जो हज़रत ख़दीजातुल कुबरा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के बत्न से पैदा हुईं:
हज़रत ज़ैनब (जिनका निकाह हज़रत अबुल आस से हुआ)
हज़रत रुक़य्या और हज़रत उम्मे कुलसूम (जिन दोनों का निकाह एक के बाद दीगरे हज़रत उस्मान ग़नी से हुआ)
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (जिनका निकाह हज़रत अली अल-मुर्तज़ा से हुआ)
हज़रत फ़ातिमा के सिवा बाकी तीनों साहबज़ादियों का विसाल हुज़ूर ﷺ की ज़ाहिरी हयात में हुआ, जबकि हज़रत फ़ातिमा का विसाल हुज़ूर ﷺ के छह माह बाद हुआ।
इनके अलावा आपकी चार रबीबा (सौतेली बेटियाँ) थीं—बर्रह, सलमा, उमराह और वर्रह—जो हज़रत उम्मे सलमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की बेटियाँ थीं, जैसा कि तफ़्सीर रूहुल मआनी में मज़कूर है।
जब औरतें घरों से बाहर निकलें, तो उन्हें सिर्फ़ दुपट्टा ही नहीं ओढ़ना चाहिए बल्कि बड़ी चादर (जिलबाब) से अपने पूरे बदन को ढांकना चाहिए। और उस चादर का एक हिस्सा अपने चेहरे पर लटकाना चाहिए ताकि उनका चेहरा भी छुपा रहे।
इस हुक्म का मक़सद यह था कि आज़ाद और पाकीज़ा मुसलमान औरतें लौंडियों (बांदियों) से अलग पहचानी जाएं, क्योंकि उस दौर में लौंडियाँ बे-चेहरा छुपाए निकलती थीं। चादर और नक़ाब से उनकी इज़्ज़त व शराफ़त नुमायां होती थी।
मदीने के मुनाफ़िक़ और बदकार लोग औरतों को, ख़ास तौर पर लौंडियों को छेड़ते और सताते थे। इसलिए आज़ाद मोमिन औरतों को हुक्म दिया गया कि वे परदे के ज़रिए अपनी मुन्फ़रिद और बा-वक़ार पहचान बनाएं ताकि शरारती लोग उनके क़रीब भटकने की हिम्मत न करें।
इससे यह भी साबित होता है कि मर्दों का औरतों की शक्ल बनाना और औरतों का मर्दों की मुशाबहत इख़्तियार करना हराम है। जब औरतों को लौंडियों से मुम्ताज़ रहने का हुक्म है, तो मर्दों से मुम्ताज़ रहना बदरजा-ए-औला ज़रूरी है।
हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने एक लौंडी को आज़ाद औरतों की तरह चादर ओढ़ने पर सज़ा दी थी, जिससे साबित हुआ कि परदा सिर्फ़ आज़ाद मुसलमान औरतों पर लाज़िम था, लौंडियों पर नहीं।
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