कुरान - 33:61 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

61
مَّلۡعُونِينَۖ أَيۡنَمَا ثُقِفُوٓاْ أُخِذُواْ وَقُتِّلُواْ تَقۡتِيلٗا

Transliteration: (Mal'ooneena ainamaa suqifoo ukhizoo wa quttiloo taqteelaa)

फ़िटकारे हुए (लानती) होंगे; जहाँ कहीं पाए जाएंगे पकड़े जाएंगे और चुन-चुन कर क़त्ल किए जाएंगे [182]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 61 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 61

"फ़िटकारे हुए होंगे; जहाँ कहीं पाए जाएंगे पकड़े जाएंगे और चुन-चुन कर क़त्ल किए जाएंगे [182]।"

[182] मुसलसल निफ़ाक़ और फ़ित्ना-परवरी का अंजाम

यह आयत-ए-मुबारका उन मुनाफ़िक़ों के अंजाम को बयान फ़रमाती है जो अपनी शरारतों और फ़ित्ना-परवरी से बाज़ नहीं आते: वे जहाँ भी पाए जाएंगे उन पर लानत होगी, और अगर वे अपनी सरकशी से बाज़ न आए तो पकड़-पकड़ कर क़त्ल कर दिए जाएंगे।

हालाँकि यह बात समझनी चाहिए कि हुज़ूर ﷺ की ज़ाहिरी हयात में मुनाफ़िक़ों को आम तौर पर क़त्ल करने या शहर-बदर करने का हुक्म नाफ़िज़ नहीं किया गया, अगरचे उनके नाम और चेहरे मालूम थे।

यह तवक्कुफ़ और सब्र मुआशरे के अमन व नज़्म को बरक़रार रखने और आम लोगों में किसी ग़लतफ़हमी से बचने की ख़ातिर था, जो मुनाफ़िक़ों के अंदरूनी मकर व फ़रेब से पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं थे।

लेकिन अगर वे खुली दुश्मनी और फ़ित्ने पर मुसलसल क़ायम रहते, जैसा कि पिछली आयत में ताकीद की गई, तो उन पर यह सज़ा नाफ़िज़ कर दी जाती—जिससे ज़ाहिर होता है कि सज़ा से पहले तौबा और इस्लाह की मुहलत दी गई।

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