Transliteration: (Sunnatal laahi fil lazeena khalaw min qablu wa lan tajida lisunnatil laahi tabdeelaa)
"यही अल्लाह का दस्तूर उन लोगों में रहा है जो पहले गुज़र चुके हैं [183]। और आप अल्लाह के दस्तूर में हरगिज़ कोई तबदीली न पाएंगे [184]।"
पिछली उम्मतों के मुनाफ़िक़ों और फ़ित्ना-परवरों ने भी ऐसे ही बुरे आमाल किए जो अज़ाब-ए-इलाही का बाइस बने। यह आयत वाज़ेह करती है कि निफ़ाक़, फ़रेब और फ़साद के ख़िलाफ़ अल्लाह तआला का क़ानून पूरी तारीख़ में हमेशा अद्ल व इंसाफ़ के एक ही उसूल पर क़ायम रहा है।
अगली उम्मतों के मुनाफ़िक़ों ने भी जब ऐसी ही शरारतें कीं, तो उन्हें भी अपने आमाल की सज़ा भुगतनी पड़ी। लिहाज़ा पिछली आयत में मज़कूर सज़ा कोई नया या अनोखा तरीक़ा नहीं है।
यह फ़रमान कि “आप अल्लाह के दस्तूर में हरगिज़ कोई तबदीली न पाएंगे” यह साबित करता है कि अल्लाह तआला के तमाम आफ़आल हिकमत, मुस्तक़िल मिज़ाजी और कामिल अद्ल पर मबनी हैं।
अल्लाह तआला का कोई फ़ैसला इत्तिफ़ाक़िया या बे-मक़सद नहीं होता। गुनाहगारों और फ़ित्ना-परवरों के लिए उसकी मुक़र्रर करदा सज़ाएं हिकमत-ए-इलाही का हिस्सा हैं, और वह दस्तूर ज़माने और क़ौमों के बदलने से कभी नहीं बदलता।
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