कुरान - 33:63 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

63
يَسۡـَٔلُكَ ٱلنَّاسُ عَنِ ٱلسَّاعَةِۖ قُلۡ إِنَّمَا عِلۡمُهَا عِندَ ٱللَّهِۚ وَمَا يُدۡرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ تَكُونُ قَرِيبًا

Transliteration: (Yas'alukan naasu 'anis Saa'ati qul innamaa 'ilmuhaa 'indal laah; wa maa yudreeka la'allas Saa'ata takoonu qareebaa)

लोग आपसे क़यामत के बारे में पूछते हैं [185]; आप फ़रमा दीजिए: "उसका इल्म तो बस अल्लाह ही के पास है", और आपको क्या मालूम शायद क़यामत क़रीब ही आ पहुंची हो [186]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 63 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 63

"लोग आपसे क़यामत के बारे में पूछते हैं। आप फ़रमा दीजिए: 'उसका इल्म तो बस अल्लाह ही के पास है', और आपको क्या मालूम शायद क़यामत क़रीब ही आ पहुंची हो [186]!"

[185] शान-ए-नुज़ूल: आज़माइश और इम्तिहान का मक़सद

यह आयत-ए-मुबारका मुशरिकों और यहूदियों के सवालात के जवाब में नाज़िल हुई, जो हुज़ूर ﷺ से सवाल करके या तो मज़ाक़ उड़ाना चाहते थे या इम्तिहान लेना चाहते थे।

मुशरिक मज़ाक़ के तौर पर पूछते थे, जबकि यहूदी हुज़ूर ﷺ को ला-जवाब करने के लिए सवाल करते थे—ताकि क़यामत का मुअय्यन दिन, तारीख़ और साल मालूम कर सकें।

उनका मक़सद यह था कि अगर आप तारीख़ बता दें, तो कहेंगे कि यह इल्म तो सिर्फ़ अल्लाह का है लिहाज़ा आप ग़लत हैं; और अगर आप बताने से इनकार फ़रमाएं, तो नुबुव्वत पर एतराज़ करते हुए कहेंगे: "यह कैसे नबी हैं जिन्हें क़यामत का इल्म नहीं?"

वे इस बात से ग़ाफ़िल थे कि आख़िरी नबी ﷺ की निशानियों में से यह भी है कि आप रूह की हक़ीक़त, क़यामत का मुअय्यन वक़्त या असहाबे कहफ़ की सहीह तादाद को ज़ाहिर न फ़रमाएंगे—क्योंकि ये बातें अल्लाह तआला ने मख़फ़ी (पोशीदा) रखी हैं।

[186] क़यामत क़रीब है – तैयारी पर तवज्जोह की दावत

यह आयत याद दिलाती है कि क़यामत बहुत क़रीब है, और असल तवज्जोह तैयारी करने पर होनी चाहिए, न कि फ़िज़ूल बहसों पर।

अगरचे हुज़ूर ﷺ को क़यामत की तमाम निशानियों का कामिल इल्म अता किया गया, मगर आपको उसका मुअय्यन वक़्त ज़ाहिर न करने का हुक्म दिया गया। यह हिकमत-ए-इलाही के ऐन मुताबिक़ था कि वह वक़्त पोशीदा रहे।

इसके बावजूद हुज़ूर ﷺ ने क़यामत की सैकड़ों निशानियां बयान फ़रमाईं और यहाँ तक कि ख़ास मालूमात भी अता फ़रमाईं जैसे:

  • क़यामत जुमा के दिन क़ायम होगी

  • उस दिन आशूरा (10 मुहर्रम) का दिन होगा

मज़ीद तफ़्सील के लिए उलमा-ए-किराम “जा अल-हक़” जैसी किताबों की तरफ़ रुजू फ़रमाते हैं। असल पैग़ाम यह है कि इंसान हर वक़्त अपने आमाल की फ़िक्र करे, क्योंकि वह घड़ी गुमान से भी ज़्यादा क़रीब हो सकती है।

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