कुरान - 33:60 सूरह अल-अहज़ाब अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

60
۞لَّئِن لَّمۡ يَنتَهِ ٱلۡمُنَٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٞ وَٱلۡمُرۡجِفُونَ فِي ٱلۡمَدِينَةِ لَنُغۡرِيَنَّكَ بِهِمۡ ثُمَّ لَا يُجَاوِرُونَكَ فِيهَآ إِلَّا قَلِيلٗا

Transliteration: (La'il lam yantahil munaafiqoona wallazeena fee quloobihim maradunw walmur jifoona fil madeenati lanughri yannaka bihim summa laa yujaawiroonaka feehaaa illaa qaleela)

अगर मुनाफ़िक़ और वे लोग जिनके दिलों में बीमारी है [178], और मदीना में झूठी अफ़वाहें फैलाने वाले [179] बाज़ न आए, तो हम ज़रूर आपको उन पर मुसल्लत फ़रमा देंगे [180], फिर वे मदीना में आपके पड़ोस में बहुत कम दिन रह सकेंगे [181]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अहज़ाब आयत 60 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अहज़ाब तफ़सीर - आयत 60

"अगर मुनाफ़िक़ और वे लोग जिनके दिलों में बीमारी है [178], और मदीना में झूठी अफ़वाहें फैलाने वाले [179] बाज़ न आए, तो हम ज़रूर आपको उन पर मुसल्लत फ़रमा देंगे [180], फिर वे मदीना में आपके पड़ोस में बहुत कम दिन रह सकेंगे [181]।"

[178] मुनाफ़िक़ों और फ़ासिक़ों की हक़ीक़त

जिनके दिलों में बीमारी है उनसे मुराद बदकार, अय्याश और बेहया लोग हैं जिनकी फ़िक्र और किरदार फ़ासिदाना था। यह बात याद रखनी चाहिए कि ये लोग काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों में से थे—हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस सहाबा-ए-किराम में से कोई भी हरगिज़ ऐसा नहीं था। सहाबा-ए-किराम में से कोई शख़्स ऐसी बदकिरदारी का मुर्तकिब नहीं हो सकता।

[179] मदीना मुनव्वरा में झूठी अफ़वाहें उड़ाना

इससे मुराद वे शरारती अनासिर हैं जो इस्लामी लश्कर के बारे में झूठी और मनगढ़ंत ख़बरें उड़ाते थे, जैसे यह कि मुसलमान शिकस्त खा गए या फुलां अज़ीम सहाबी शहीद हो गए।

उनका मक़सद मुजाहिदीन के घर वालों और मदीना मुनव्वरा में मौजूद कमज़ोर लोगों के दिलों में ख़ौफ़, बेचैनी और मायूसी पैदा करना था।

[180] मुक़ाबले और सज़ा देने का इलाही हुक्म

अगर ये शरारती गिरोह अपनी इन नापाक हरकतों से बाज़ न आते, तो अल्लाह तआला हुज़ूर ﷺ को क़तई इख़्तियार और फ़रमान अता फ़रमा देता कि आप इनके सरगनाओं को क़त्ल कराएं और बाक़ियों को शहर-बदर फ़रमा दें।

[181] मदीना मुनव्वरा से फ़ौरी इख़्राज

जब हुज़ूर ﷺ को यह इख़्तियार नाफ़िज़ करने का हुक्म होता, तो ये लोग मदीने से निकाल बाहर किए जाते और फिर वे वहाँ सिर्फ़ चंद दिन ही टिक पाते—उतना ही वक़्त जितना बोरिया-बिस्तर समेटने में लगता है।

यह सख़्त वईद एक वारनिंग और मुकम्मल पाबंदी थी कि मदीना मुनव्वरा जैसी पाकीज़ा सरज़मीन पर इस्लाम के दुश्मनों और मुनाफ़िक़ों को फ़ित्ना फैलाने की हरगिज़ इजाज़त नहीं दी जा सकती।

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