Transliteration: (Innal lazeena yu'zoonal laaha wa Rasoolahoo la'anahumul laahu fid dunyaa wal Aakhirati wa a'adda lahum 'azaabam muheenaa)
"बेशक जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को ईज़ा पहुंचाते हैं, अल्लाह की उन पर दुनिया और आख़िरत में लानत [169] है; और उसने उनके लिए ज़लील करने वाला अज़ाब [170] तैयार कर रखा है।"
इससे यह उसूल साबित होता है कि हर वह काम जिससे हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ को तकलीफ़ या नागवारी पहुंचे, हराम है, ख़्वाह वह ज़ाहिर में इबादत ही क्यों न नज़र आता हो। अगर किसी शख़्स की नमाज़ हुज़ूर ﷺ के आराम में ख़लल डाले, तो वह नमाज़ जायज़ नहीं रहती। इसके बरअक्स अगर नमाज़ मौख़र करके हुज़ूर ﷺ के आराम का ख़याल रखा जाए, तो ऐसा करना लाज़िम और अफ़ज़ल बन जाता है।
चुनांचे जंगे ख़ैबर के मौक़े पर सहाबा-ए-किराम ने हुज़ूर ﷺ के आराम में ख़लल न पड़ने की ख़ातिर असर की नमाज़ को मौख़र फ़रमाया। यह अमल, बावजूद नमाज़ की ताख़ीर के, हुज़ूर ﷺ के एहतिराम की वजह से इबादत का आला तरीन मर्तबा क़रार पाया।
अल्लाह को ईज़ा पहुंचाने का मतलब यह है कि लोग उसकी ज़ात के लिए ऐसे नामुनासिब औसाफ़ बयान करें जिनसे वह पाक व मुनज़्ज़ह है। इसी तरह उसके बर्गुज़ीदा बंदों, ख़ास तौर पर हुज़ूर ﷺ की शान में गुस्ताख़ी करना, आपके अफ़आल का मज़ाक़ उड़ाना या आपकी ताज़ीम में रुकावट डालना भी ईज़ा-रसानी है।
जो शख़्स नबी-ए-पाक ﷺ पर तअन-ज़नी करे, आपकी नाअत व महफ़िलों को रोके, या आपकी ज़ात में ऐब तलाश करे, वह इस आयत की रू से दुनिया और आख़िरत में लानत का मुस्तहिक़ है और आख़िरत में ज़लील व रुसवा करने वाले अज़ाब में मुब्तला होगा।
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