Transliteration: (Qad khasiral lazeena qatalooo awlaadahum safaham bighairi 'ilminw wa harramoo maa razaqahumul laahuf tiraaa'an 'alal laah; qad dalloo wa maa kaanoo muhtadeen)
जाहिलीयत के ज़माने में अरब के क़बीले अपनी बेटियों को ज़िंदा दफ़ना देते थे, और कुछ क़बीले बेटों को भी क़ुर्बान कर देते थे। यह अमल उन्हें दोनों जहानों में हलाक़ करने वाला था। अजीब बात यह थी कि जानवरों की हिफ़ाज़त की जाती, लेकिन अपनी औलाद को बेरहमी से मार दिया जाता।
यह औलाद-कुशी उनकी मूर्खता और अज्ञानता का नतीजा था। शरीअत के लिहाज़ से जिस बच्चे में रूह फूँक दी जाए, उसका गर्भपात करना भी औलाद-कुशी के बराबर है। उससे पहले की हालत में भी सिर्फ़ ज़रूरत की सूरत में इजाज़त है।
अल्लाह ने इंसानों के लिए सारी चीज़ें रिज़्क़ बनाई हैं। असल हुक्म यही है कि हर चीज़ हलाल है, सिवाय उस चीज़ के जिसे अल्लाह ने हराम ठहरा दिया हो। जैसे कि आयत [2:29] में है: “उसने तुम्हारे लिए ज़मीन की सारी चीज़ें पैदा कीं।”
जो लोग फ़स्ल और मवेशियों को बुतों के नाम पर हराम ठहराते थे, वे दरअस्ल अल्लाह पर झूठ गढ़ते थे। अस्ल में वह चीज़ें तब तक हलाल रहती हैं जब तक अल्लाह ने उन्हें साफ़ तौर पर हराम न कर दिया हो।
जो लोग गुनाहों को दीन समझकर करते हैं और शिर्क को कामयाबी समझते हैं, वे हक़ीक़ी हिदायत से बहुत दूर हैं। अस्ल हिदायत तो अल्लाह से डरने और उसके बताए हुए हुक्मों को मानने में है, न कि झूठे अक़ीदे गढ़ने में।
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