कुरान - 6:141 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

141
۞وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنشَأَ جَنَّـٰتٖ مَّعۡرُوشَٰتٖ وَغَيۡرَ مَعۡرُوشَٰتٖ وَٱلنَّخۡلَ وَٱلزَّرۡعَ مُخۡتَلِفًا أُكُلُهُۥ وَٱلزَّيۡتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُتَشَٰبِهٗا وَغَيۡرَ مُتَشَٰبِهٖۚ كُلُواْ مِن ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثۡمَرَ وَءَاتُواْ حَقَّهُۥ يَوۡمَ حَصَادِهِۦۖ وَلَا تُسۡرِفُوٓاْۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلۡمُسۡرِفِينَ

Transliteration: (Wa Huwal lazee ansha-a jannaatim ma'rooshaatinw wa ghaira ma'rooshaatinw wan nakhla wazzar'a mukhtalifan ukuluhoo wazzaitoona warrum maana mutashaabihanw wa ghaira mutashaabih; kuloo min samariheee izaaa asmara wa aatoo haqqahoo yawma hasaadihee wa laa tusrifoo; innahoo laa yuhibbul musrifeen)

और वही है जिसने पैदा किए बाग़ात [315] – कुछ टेक पर चढ़ने वाले बेलों वाले, और कुछ बिना सहारे के, और खजूर के दरख़्त, और खेती जिनका फल अलग-अलग किस्मों का है, और जैतून और अनार – कुछ एक-दूसरे से मिलते-जुलते और कुछ बिलकुल जुदा-जुदा। तो उनमें से फल खाओ [316] जब वह पक जाए, और उसका हक़ अदा करो उसके कटाई के दिन [317], और फ़िज़ूल-खर्ची न करो; बेशक अल्लाह फ़िज़ूल-खर्च करने वालों को पसंद नहीं करता [318]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 141 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 141 की तफ़्सीर

✅ [315] पैदा किए गए बाग़ात – क़ुदरत की निशानी

अल्लाह ने इंसानों के लिए अलग-अलग किस्म की खेती और बाग़ात बनाए। कुछ पौधे सहारे से चढ़ने वाले (जैसे बेलें), और कुछ खड़े होने वाले (जैसे पेड़)। अनार और जैतून कभी एक जैसे लगते हैं, लेकिन उनके ज़ायके और असरात अलग-अलग होते हैं। यह अल्लाह की क़ुदरत और विविधता की दलील है।

✅ [316] हलाल फल खाने की इजाज़त

अल्लाह ने अपने बन्दों को हुक्म दिया कि जब फल पक जाएँ तो उन्हें हलाल और जायज़ समझकर खाओ। उन्हें अपने ऊपर हराम ठहराना या तकल्लुफ़ करना दीनदारी नहीं है। असली परहेज़गारी वह है कि इंसान सिर्फ़ वही छोड़े जिसे अल्लाह ने हराम किया हो।

✅ [317] फसलों पर ज़कात अदा करना

यह आयत इस बात की सख़्त दलील है कि खेती-बाड़ी की पैदावार पर भी ज़कात वाजिब है। इसी लिए इमाम अबू हनीफ़ा रह. का क़ौल है कि थोड़ी या ज़्यादा हर पैदावार पर ज़कात है। बाक़ी माल की तरह इसमें साल गुजरने की शर्त नहीं, बल्कि कटाई के दिन ही हक़ अदा करना लाज़मी है।

✅ [318] फ़िज़ूल-खर्ची से बचना

फ़िज़ूल-खर्ची हर हाल में मना है – चाहे खाने-पीने में हो, माल खर्च करने में, या इबादतों में हद से बढ़ जाने में। जैसे वुज़ू में तीन दफ़ा धोने की हद है, चार दफ़ा धोना इसराफ़ है। अल्लाह इसराफ़ करने वालों को पसंद नहीं करता।

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