Transliteration: (Qul inneee akhaafu in 'asaitu Rabbee 'azaaba Yawmin 'Azeem)
इस आयत में नबी करीम ﷺ को हुक्म दिया गया कि वो कहें:
"अगर मैं ना-फ़रमानी करूं..." —
हालांकि ये बात नामुमकिन है, क्योंकि
ये सिर्फ़ एक तालीमी और इबरतनाक अंदाज़ में कही गई बात है,
ताकि लोगों को डर और समझ आए।
➡️ इसी तरह का अंदाज़ सूरा अज़-ज़ुखरुफ़ (43:81) में भी है:
"कह दो: अगर रहमान की कोई औलाद होती, तो मैं सबसे पहले उसकी इबादत करता।"
– ये भी एक मुहाल (असंभव) मिसाल है,
जिसका मक़सद है झूठे अकीदों की रद्दी करना और हक़ को उजागर करना।
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