कुरान - 6:151 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

151
۞قُلۡ تَعَالَوۡاْ أَتۡلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمۡ عَلَيۡكُمۡۖ أَلَّا تُشۡرِكُواْ بِهِۦ شَيۡـٔٗاۖ وَبِٱلۡوَٰلِدَيۡنِ إِحۡسَٰنٗاۖ وَلَا تَقۡتُلُوٓاْ أَوۡلَٰدَكُم مِّنۡ إِمۡلَٰقٖ نَّحۡنُ نَرۡزُقُكُمۡ وَإِيَّاهُمۡۖ وَلَا تَقۡرَبُواْ ٱلۡفَوَٰحِشَ مَا ظَهَرَ مِنۡهَا وَمَا بَطَنَۖ وَلَا تَقۡتُلُواْ ٱلنَّفۡسَ ٱلَّتِي حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلۡحَقِّۚ ذَٰلِكُمۡ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمۡ تَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Qul ta'aalaw atlu maa harrama Rabbukum 'alaikum allaa tushrikoo bihee shai'anw wa bilwaalidaini ihsaananw wa laa taqtulooo awlaadakum min imlaaq; nahnu narzuqukum wa iyyaahum wa laa taqrabul fawaahisha maa zahara minhaa wa maa batana wa laa taqtulun nafsal latee harramal laahu illaa bilhaqq; zaalikum wassaakum bihee la'allakum ta'qiloon)

कह दो: आओ, मैं तुम्हें पढ़कर सुनाऊँ वह चीज़ें जिन्हें तुम्हारे रब ने तुम्हारे लिए हराम किया है [350]: कि तुम उसके साथ किसी को साझी न ठहराओ, और माता-पिता के साथ अच्छा बर्ताव करो [351], और अपनी औलाद को तंगदस्ती के डर से क़त्ल न करो [352]। हम उन्हें भी रोज़ी देते हैं और तुम्हें भी [353]। और बदकारियों के क़रीब न जाओ, चाहे वह ज़ाहिर हों या छुपी हुई [354], और उस जान को क़त्ल न करो जिसे अल्लाह ने हराम ठहराया है, मगर हक़ के साथ [355]। यही उसने तुम्हें ताकीद की है ताकि तुम समझो। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 151 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 151 की तफ़्सीर

✅ [350] सार्वभौमिक पाबंदियाँ – हर आसमानी किताब में मौजूद

ये अहकाम तौरात और इंजील में भी मौजूद थे और कुरआन ने दोबारा उनकी तस्दीक़ की। इससे साबित होता है कि नबी ﷺ को पहले की किताबों का असल पैग़ाम वही से मिला और सब इंसानों पर ये बुनियादी नैतिक कानून लागू होते हैं—जैसे शिर्क से बचना, इंसानियत का सम्मान करना और नाहक़ क़त्ल न करना।

✅ [351] माता-पिता के हुक़ूक़ – ईमान वाले हों या न हों

वालिदैन के साथ अच्छाई हर हाल में लाज़िमी है, चाहे वे मुसलमान हों या न हों। इसमें शामिल है—इज़्ज़त देना, ख़िदमत करना, उनकी ज़रूरतें पूरी करना और मरने के बाद उनके लिए दुआ करना।

✅ [352] ग़रीबी के डर से औलाद का क़त्ल हराम

यह आयत उन ग़रीब घरों से सम्बंधित है जो फ़क़्र की वजह से औलाद को क़त्ल कर देते थे। किसी भी आर्थिक वजह से बच्चे की ज़िंदगी छीनना हराम है।

✅ [353] रिज़्क़ देने वाला सिर्फ़ अल्लाह है

औलाद और माँ-बाप दोनों का रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे है। ग़रीबी या मुफ़लिसी औलाद के क़त्ल का कोई बहाना नहीं।

✅ [354] ज़ाहिरी और छुपी हुई फ़हाशियों से दूर रहो

इससे मुराद है—खुली बदकारियाँ जैसे ज़िना और छुपी बदकारियाँ जैसे गुप्त गुनाह या बुरे ख्यालात। सच्चा तक़वा वही है जो अल्लाह के डर से इंसान को गुनाह से, चाहे ज़ाहिर हों या छुपे, रोक दे।

✅ [355] नाहक़ क़त्ल सख़्त हराम है

हर जान अल्लाह की हिफ़ाज़त में है। क़त्ल सिर्फ़ शरीअत के मुक़म्मल तरीक़े से ही जायज़ है—जैसे क़त्ल का बदला, शादीशुदा के ज़िना की सज़ा या बग़ावत। यह हक़ सिर्फ़ हाकिम और क़ाज़ी को है, किसी फ़र्द को नहीं।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now