Transliteration: (Qul ta'aalaw atlu maa harrama Rabbukum 'alaikum allaa tushrikoo bihee shai'anw wa bilwaalidaini ihsaananw wa laa taqtulooo awlaadakum min imlaaq; nahnu narzuqukum wa iyyaahum wa laa taqrabul fawaahisha maa zahara minhaa wa maa batana wa laa taqtulun nafsal latee harramal laahu illaa bilhaqq; zaalikum wassaakum bihee la'allakum ta'qiloon)
ये अहकाम तौरात और इंजील में भी मौजूद थे और कुरआन ने दोबारा उनकी तस्दीक़ की। इससे साबित होता है कि नबी ﷺ को पहले की किताबों का असल पैग़ाम वही से मिला और सब इंसानों पर ये बुनियादी नैतिक कानून लागू होते हैं—जैसे शिर्क से बचना, इंसानियत का सम्मान करना और नाहक़ क़त्ल न करना।
वालिदैन के साथ अच्छाई हर हाल में लाज़िमी है, चाहे वे मुसलमान हों या न हों। इसमें शामिल है—इज़्ज़त देना, ख़िदमत करना, उनकी ज़रूरतें पूरी करना और मरने के बाद उनके लिए दुआ करना।
यह आयत उन ग़रीब घरों से सम्बंधित है जो फ़क़्र की वजह से औलाद को क़त्ल कर देते थे। किसी भी आर्थिक वजह से बच्चे की ज़िंदगी छीनना हराम है।
औलाद और माँ-बाप दोनों का रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे है। ग़रीबी या मुफ़लिसी औलाद के क़त्ल का कोई बहाना नहीं।
इससे मुराद है—खुली बदकारियाँ जैसे ज़िना और छुपी बदकारियाँ जैसे गुप्त गुनाह या बुरे ख्यालात। सच्चा तक़वा वही है जो अल्लाह के डर से इंसान को गुनाह से, चाहे ज़ाहिर हों या छुपे, रोक दे।
हर जान अल्लाह की हिफ़ाज़त में है। क़त्ल सिर्फ़ शरीअत के मुक़म्मल तरीक़े से ही जायज़ है—जैसे क़त्ल का बदला, शादीशुदा के ज़िना की सज़ा या बग़ावत। यह हक़ सिर्फ़ हाकिम और क़ाज़ी को है, किसी फ़र्द को नहीं।
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