Transliteration: (Wa laa taqraboo maalal yateemi illaa billatee hiyaa ahsanu hattaa yablugha ashuddahoo wa awful kaila walmeezaana bilqisti laa nukallifu nafsan illaa wus'ahaa wa izaa qultum fa'diloo wa law kaana zaa qurbaa wa bi 'ahdil laahi awfoo; zaalikum wassaakum bihee la'allakum tazakkaroon)
यतीम वह बच्चा है जिसका बाप मर चुका हो, और यह हुक्म उसकी बुलुग़ और रुश्द तक है। सरपरस्त को यतीम के माल में सिर्फ़ भलाई और फ़ायदे वाले तरीक़े से तसर्रुफ़ करने की इजाज़त है, न कि नुक़सान पहुँचाने की। यतीम के माल पर ज़कात लाज़िम नहीं, मगर सरपरस्त अगर उससे फ़ायदा उठाए तो सिर्फ़ बेहतर तरीक़े से।
कारोबार और लेन-देन में पूरा तोलना और नापना फ़र्ज़ है। धोखाधड़ी, कमी या दूसरों का हक़ मारना हराम है। इस्लाम सख़ावत को पसंद करता है—बेचते वक़्त ज़्यादा देना और ख़रीदते वक़्त थोड़ा कम लेना।
अल्लाह किसी पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। छोटी-सी ग़लती या अनजाने में हुई कमी माफ़ है, मगर जानबूझकर किया गया ज़ुल्म बड़ा गुनाह है। इस्लाम में नीयत का बहुत बड़ा दख़ल है।
गवाही देते, फ़ैसला करते या बयान देते वक़्त सच और इंसाफ़ पर क़ायम रहना ज़रूरी है, चाहे मामला अपने करीबी रिश्तेदार ही का क्यों न हो। रिश्तेदारी या समाजी दबाव से हटकर निष्पक्ष इंसाफ़ करना असली तक़वा है।
अल्लाह, उसके रसूल ﷺ, दीन के काम या इंसानों के साथ जो भी वायदा या अहद किया जाए, उसे पूरा करना फ़र्ज़ है। शादी (निकाह) जैसे अहद भी इसी वजह से अल्लाह के नाम से पुख़्ता किए जाते हैं।
यहाँ "वसीयत" का मतलब मौत के वक़्त छोड़ी गई वसीयत नहीं, बल्कि पुख़्ता और सख़्त हुक्म है। अरब तहज़ीब में वसीयत को सबसे अहम और लाज़िमी समझा जाता था—इसी तश्बीह से अल्लाह तआला ने अपने अहकाम को सबसे अहम और लाज़िमी बना कर पेश किया।
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