कुरान - 6:154 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

154
ثُمَّ ءَاتَيۡنَا مُوسَى ٱلۡكِتَٰبَ تَمَامًا عَلَى ٱلَّذِيٓ أَحۡسَنَ وَتَفۡصِيلٗا لِّكُلِّ شَيۡءٖ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ لَّعَلَّهُم بِلِقَآءِ رَبِّهِمۡ يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Summa aatainaa Moosal Kitaaba tammaaman 'alal lazeee ahsana wa tafseelal likulli shai'inw wa hudanw wa rahmatal la'allahum biliqaaa'i Rabbihim yu'minoon)

फिर हमने मूसा को किताब दी [364] — उस पर नेमत पूरी करने के लिए जो भलाई करता है, और हर चीज़ की तफ़्सील बयान करने के लिए, और हिदायत व रहमत के तौर पर — ताकि वे अपने रब से मुलाक़ात पर ईमान लाएँ [365]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 154 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 154 की तफ़्सीर

✅ [364] तौरात का नाज़िल होना

  • तौरात (तौराह) पहली मुकम्मल इलाही किताब थी जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर उतारी गई।
  • इससे पहले अंबिया को सिर्फ़ सह़ीफ़े (काग़ज़ात/पर्चे) दिए गए थे।
  • आयत में "फिर" कहने का मक़सद यह याद दिलाना है कि बनी इस्राईल को भी पहले एक मुकम्मल आसमानी किताब दी गई थी।
  • जो लोग नेकअमली करते थे, अल्लाह की नेमत उनके लिए पूरा इनाम बन जाती थी।

✅ [365] तौरात का मक़सद: तफ़्सील, हिदायत और रहमत

  • शुरू में तौरात में हर तरह की तफ़्सील मौजूद थी, ताकि बनी इस्राईल सही राह पर चल सकें।
  • जब हज़रत मूसा ने ग़ज़ब में अल्वाह (तख़्तियाँ) पटक दीं, तो बहुत-सी तफ़्सील हटा ली गई और सिर्फ़ अहम हुक्मात बाक़ी रखे गए।
  • इसके बावजूद, तौरात बनी इस्राईल के लिए हिदायत और रहमत बनी रही और उन्हें आख़िरत पर ईमान लाने की दावत देती रही।

✅ क़ुरआन से तुलना

  • क़ुरआन, तौरात के मुक़ाबले में, हमेशा महफ़ूज़ और मुकम्मल है।
  • यह हर पहलू से मक़ामिल और मुकम्मल तफ़्सील देता है।
  • पहले की किताबों की तस्दी़क़ और तक़मील करता है और हमेशा के लिए बाक़ी रहेगा।

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