कुरान - 6:156 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

156
أَن تَقُولُوٓاْ إِنَّمَآ أُنزِلَ ٱلۡكِتَٰبُ عَلَىٰ طَآئِفَتَيۡنِ مِن قَبۡلِنَا وَإِن كُنَّا عَن دِرَاسَتِهِمۡ لَغَٰفِلِينَ

Transliteration: (An taqooloo inna maaa unzilal Kitaabu 'alaa taaa'ifataini min qablinaa wa in kunnaa 'an diraasatihim laghaafileen)

ताकि तुम यह न कहो कि किताब तो बस हमसे पहले के दो गिरोहों पर ही उतारी गई थी और हम तो वाक़ई उस चीज़ से ग़ाफ़िल थे जो वे पढ़ते थे [368]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 156 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 156 की तफ़्सीर

✅ [368] अरबी में क़ुरआन नाज़िल होने से कोई उज्र (बहाना) बाक़ी न रहा

  • इस आयत से अरबों का वह बहाना ख़त्म कर दिया गया कि:
    • तौरात (यहूद पर नाज़िल) इब्रानी ज़बान में थी।
    • इंजील (नसरानी पर नाज़िल) भी इब्रानी में थी।
    • अरब इन भाषाओं से नासमझ थे और उन पर कोई नबी भी नहीं आया था।
  • इस वजह से वे कहते थे: “हमें नहीं मालूम कि उन पर क्या नाज़िल हुआ, इसलिए हम ज़िम्मेदार नहीं हैं।”

✅ क़ुरआन अरबी में – आम रहनुमाई

  • अल्लाह ने क़ुरआन को अरबी में नाज़िल किया ताकि:
    • ज़बान की नासमझी का बहाना ख़त्म हो।
    • सीधी रहनुमाई अरबों तक पहुँचे, बिना यहूद-नसरानी पर निर्भर हुए।
  • हज़रत मुहम्मद ﷺ की पैग़म्बरी के साथ अब कोई यह नहीं कह सकता कि उसे रहनुमाई या रसूल नहीं मिला।

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