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أَوۡ تَقُولُواْ لَوۡ أَنَّآ أُنزِلَ عَلَيۡنَا ٱلۡكِتَٰبُ لَكُنَّآ أَهۡدَىٰ مِنۡهُمۡۚ فَقَدۡ جَآءَكُم بَيِّنَةٞ مِّن رَّبِّكُمۡ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٞۚ فَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّن كَذَّبَ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَصَدَفَ عَنۡهَاۗ سَنَجۡزِي ٱلَّذِينَ يَصۡدِفُونَ عَنۡ ءَايَٰتِنَا سُوٓءَ ٱلۡعَذَابِ بِمَا كَانُواْ يَصۡدِفُونَ
Transliteration: (Aw taqooloo law annaaa unzila 'alainal kitaabu lakunnaaa ahdaa minhum; faqad jaaa'akum baiyinatum mir Rabbikum wa hudanw wa rahmah; faman azlamu mimman kazzaba bi Aayaatil laahi wa sadafa 'anhaa; sanajzil lazeena yasdifoona 'an Aayaatinaa sooo'al 'azaabi bimaa kaanoo yasdifoon)
या (तुम यह न कहो कि) अगर यह किताब हम पर नाज़िल होती तो हम उनसे ज़रूर ज़्यादा हिदायतयाफ़्ता होते। तो तुम्हारे पास तो तुम्हारे रब की तरफ़ से एक ख़ुला प्रमाण आ चुका है, और हिदायत और रहमत [370] भी। तो उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह की आयतों को झुठलाए और उनसे मुँह मोड़ ले? बहुत जल्द हम उन लोगों को जो हमारी आयतों से मुँह मोड़ते हैं, एक सख़्त अज़ाब [371] का मज़ा चखाएँगे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)
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