कुरान - 6:50 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

50
قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ وَلَآ أَقُولُ لَكُمۡ إِنِّي مَلَكٌۖ إِنۡ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَيَّۚ قُلۡ هَلۡ يَسۡتَوِي ٱلۡأَعۡمَىٰ وَٱلۡبَصِيرُۚ أَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ

Transliteration: (Qul laaa aqoolu lakum 'indee khazaaa'inul laahi wa laaa a'lamul ghaiba wa laaa aqoolu lakum innee malakun in attabi'u illaa maa yoohaaa ilaiy; qul hal yastawil a'maa walbaseer; afalaa tatafakkaroon)

आप फ़रमा दीजिए [96]: "मैं तुमसे यह नहीं कहता कि अल्लाह के ख़ज़ाने मेरे पास हैं, और न ही मैं ग़ैब (छिपी बातों) को जानता हूँ, और न ही मैं फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस उसी का पालन करता हूँ जो मेरी तरफ़ वही (प्रकाशना) की जाती है।"
आप फ़रमा दीजिए: "क्या अंधा और देखने वाला बराबर हो सकते हैं? तो क्या तुम ग़ौर नहीं करते?" [99] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 50 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 50 की तफ़्सीर

✅ [96] नबूवत से झूठी उम्मीदें दूर करना

  • यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब मक्का के काफ़िर यह मांग कर रहे थे कि अगर आप वाक़ई नबी हैं तो सोने के पहाड़, बाज़ारों की भविष्यवाणी, और बेशुमार दौलत दिखाइए।
  • अल्लाह ने अपने हबीब ﷺ से फ़रमाया कि वो साफ़ तौर पर कह दें कि न नबी अल्लाह के ख़ज़ानों के मालिक हैं,
  • न उन्हें ग़ैब की मुकम्मल जानकारी है,
  • और न ही वे फ़रिश्ता हैं— बल्कि वे तो बस वही करते हैं जो उन्हें वही के ज़रिये हुक्म दिया जाता है।

✅ [97] ख़ज़ानों का होना और दावा करना

  • नबी ﷺ ने कभी ख़ज़ानों के मालिक होने का दावा नहीं किया, हालांकि उन्हें अल्लाह ने बेशुमार ख़ैरात दीं:
    "बेशक, हमने तुम्हें कौसर अता किया।" (सूरा कौसर 108:1)
  • यहां इनकार दावे का है, नेमतों के मिलने का नहीं।

✅ [98] ग़ैब का इल्म अता होता है, दावा नहीं किया गया

  • नबी ﷺ ने ग़ैब का इल्म अपने पास से होने का दावा नहीं किया,
  • लेकिन अल्लाह ने उन्हें वही के ज़रिये बहुत सी छिपी बातें बताईं।
  • यह दावों से इनकार था, अल्लाह की अता से नहीं।

✅ [99] सिर्फ़ वही ही मार्गदर्शक है

  • नबी ﷺ का तरीका यह था कि वह सिर्फ़ वही का पालन करते थे।
  • उन्होंने बताया कि "अंधा" (काफ़िर) और "देखने वाला" (मोमिन) बराबर नहीं हो सकते।
  • ग़ौर व फ़िक्र करने की दावत दी गई है, ताकि लोग हक़ को पहचानें और बेकार की मांगें छोड़कर ईमान लाएं।

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