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قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمۡ عِندِي خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعۡلَمُ ٱلۡغَيۡبَ وَلَآ أَقُولُ لَكُمۡ إِنِّي مَلَكٌۖ إِنۡ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَيَّۚ قُلۡ هَلۡ يَسۡتَوِي ٱلۡأَعۡمَىٰ وَٱلۡبَصِيرُۚ أَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ
Transliteration: (Qul laaa aqoolu lakum 'indee khazaaa'inul laahi wa laaa a'lamul ghaiba wa laaa aqoolu lakum innee malakun in attabi'u illaa maa yoohaaa ilaiy; qul hal yastawil a'maa walbaseer; afalaa tatafakkaroon)
आप फ़रमा दीजिए [96]: "मैं तुमसे यह नहीं कहता कि अल्लाह के ख़ज़ाने मेरे पास हैं, और न ही मैं ग़ैब (छिपी बातों) को जानता हूँ, और न ही मैं फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस उसी का पालन करता हूँ जो मेरी तरफ़ वही (प्रकाशना) की जाती है।"
आप फ़रमा दीजिए: "क्या अंधा और देखने वाला बराबर हो सकते हैं? तो क्या तुम ग़ौर नहीं करते?" [99] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)
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