कुरान - 6:56 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

56
قُلۡ إِنِّي نُهِيتُ أَنۡ أَعۡبُدَ ٱلَّذِينَ تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِۚ قُل لَّآ أَتَّبِعُ أَهۡوَآءَكُمۡ قَدۡ ضَلَلۡتُ إِذٗا وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلۡمُهۡتَدِينَ

Transliteration: (Qul innee nuheetu an a'budal lazeena tad'oona min doonil laah; qul laaa attabi'u ahwaaa'akum qad dalaltu izanw wa maaa ana minal muhtadeen)

मैं कह देता हूँ: मुझे मना किया गया है कि मैं उन लोगों की इबादत करूँ जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो। मैं तुम्हारी ख्वाहिशों की पैरवी नहीं करूँगा। अगर मैं ऐसा करूँ तो मैं गुमराह हो जाऊँगा और हिदायत पाने वालों में से न रहूँगा। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 56 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-अनआम – आयत 56

✅ [113]

अल्लाह ने अपने नबी ﷺ को शुरू से ही शिर्क से बचाकर रखा, यहाँ तक कि वह वह्य (वही) से पहले भी कभी बुत-परस्ती या गुनाह के करीब नहीं गए। उन्होंने कभी बतों के नाम पर ज़बह किया हुआ मांस नहीं खाया और न ही जाहिलिय्यत की रस्मों में शरीक हुए।

✅ [114]

नबी ﷺ को अल्लाह ने हमेशा गुमराही और गलत अकीदों से बचाकर रखा। यह ऐलान इस बात की तस्दीक है कि उन्होंने कभी भी काफ़िरों की ख्वाहिशों की पैरवी नहीं की और न ही कभी हिदायत के रास्ते से हटे।

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