Transliteration: (Wa izaa jaaa'akal lazeena yu'minoona bi Aayaatinaa faqul salaamun 'alaikum kataba Rabbukum 'alaa nafsihir rahmata annahoo man 'amila minkum sooo'am bijahaalatin summa taaba mim ba'dihee wa aslaha fa annahoo Ghafoorur Raheem)
ये आयत हर उस मोमिन को शामिल करती है — चाहे अतीत में हो, वर्तमान में या भविष्य में — जो सच्चे दिल से रसूल ﷺ के पास हाज़िर हो। ऐसे लोग ख़ुशख़बरी के हक़दार हैं।
जो मोमिन बेआवाज़, दिल में मोहब्बत और अदब के साथ आएं, उनके लिए हुक्म है कि उन्हें कहा जाए — "तुम पर सलामती हो"।
अल्लाह ने अपनी मर्ज़ी से अपने ऊपर रहमत को अनिवार्य कर लिया है। कोई उस पर मजबूर करने वाला नहीं, ये उसकी बेहद वसी और बिन-शर्त रहमत है।
हर गुनाह की तौबा उसी के मुताबिक होनी चाहिए — जिनका हक़ मारा गया हो, उनका हक़ लौटाना; छूटी नमाज़ें क़ज़ा करना। सिर्फ ज़बानी तौबा काफ़ी नहीं।
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