Transliteration: (Wa kazaalika fatannaa ba'dahum biba'dil liyaqoolooo ahaaa'ulaaa'i mannal laahu 'alaihim mim baininaa; alaisal laahu bi-a'lama bish shaakireen)
अल्लाह ने अमीर और ग़रीब को अलग-अलग दर्जों में रखकर एक-दूसरे के लिए इम्तेहान बनाया। अमीर काफ़िरों ने ग़रीब मुसलमानों का मज़ाक उड़ाया और तअज्जुब किया कि नीची हैसियत वाले कैसे अल्लाह के पसंदीदा हो सकते हैं।
ये वही ग़लत सोच है जिसमें दौलत को हक़ की निशानी समझा जाता है, जबकि असल दर्जा ईमान और तक़वा का है, न कि माल और रुतबे का।
अल्लाह सबसे बेहतर जानता है कि कौन उसकी हिदायत का हक़दार है। माल नहीं, बल्कि शुक्रगुज़ारी और सच्चाई असल पैमाना है।
ईमान और हिदायत अल्लाह का तोहफ़ा है, जो उसे मिलता है जो दिल से शुक्र अदा करे और सच्चा हो — चाहे उसका दुनिया में कोई रुतबा न हो।
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