Transliteration: (Wa izaa ra aital lazeena yakhoodoona feee Aayaatinaa fa a'rid 'anhum hattaa yakkhoodoo fee hadeesin ghairih; wa immaa yunsiyannakash Shaitaanu falaa taq'ud ba'dazzikraa ma'al qawmiz zaalimeen)
इस आयत में हिदायत दी गई है कि मुसलमान उन महफ़िलों में न बैठें जहाँ अल्लाह की आयतों का मज़ाक उड़ाया जाता है या उनका बेअदबी से ज़िक्र होता है। ऐसी बैठकों में रहना हराम है, जब तक कि मक़सद हक़ को बयान करना और ग़लत को रोकना न हो। यह हुक्म ईमान की हिफ़ाज़त के लिए है।
आयत यह भी बताती है कि गैर-मुसलमानों से दुनियावी या दावत-ए-इस्लाम के मक़सद से मुलाक़ात करना जायज़ है। अगर नीयत हक़ की तरफ बुलाना है, तो यह अमल सवाब का कारण है। मगर हक़ और समझौते के बीच की हद साफ़ रहनी चाहिए।
अगर कोई अनजाने में ऐसी महफ़िल में बैठ जाए जहाँ अल्लाह की आयतों की तौहीन हो रही है, तो याद आते ही फ़ौरन उठना लाज़िमी है। भूलवश बैठने की इजाज़त है, मगर जान-बूझकर रुकना गुनाह है।
इस आयत में ज़ालिमों के साथ बैठने से सख़्त मना किया गया है। बुरी सोहबत ईमान को तबाह कर देती है। जैसा कि कहा गया है — साँप जिस्म को नुकसान देता है, मगर बुरा दोस्त ईमान को ख़त्म कर देता है। इसलिए सालेह लोगों की सोहबत अपनाना ईमान की हिफ़ाज़त के लिए ज़रूरी है।
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