Transliteration: (Falammaa ra ashshamsa baazighatan qaala haazaa Rabbee haazaaa akbaru falammaaa afalat qaala yaa qawmi innee bareee'um mimmaa tushrikoon)
इस आयत में सूरज के लिए मर्दाना सर्वनाम का प्रयोग किया गया, जबकि अरबी में सूरज का लिंग मुन्नस (स्त्रीलिंग) है। यह प्रयोग अल्लाह की महानता और शक्ति के बयान के अंदाज़ में किया गया है, जहाँ इशारा सूरज की प्रकृति की तरफ़ नहीं, बल्कि झूठे तौर पर उसे दी जाने वाली रब्बियत की तरफ़ है। असल इशारा तो अल्लाह की ओर है, और यह सिर्फ़ एक तार्किक बहस का हिस्सा था, न कि वास्तविक आस्था।
हज़रत इब्राहीम عليه السلام ने अपनी क़ौम को स्पष्ट तौर पर बता दिया कि वह शिर्क के हर रूप से पाक और बरी हैं। यहाँ "तुम शरीक ठहराते हो" बहुवचन में कहा गया है, जिससे साफ़ होता है कि यह बयान उनकी क़ौम को संबोधित था। इस से यह भी साबित होता है कि इब्राहीम عليه السلام ने कभी भी मूर्तिपूजा या बहुदेववाद में हिस्सा नहीं लिया; उनका पूरा तरीका तार्किक खंडन और सच की ओर मार्गदर्शन का था।
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