कुरान - 6:80 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

80
وَحَآجَّهُۥ قَوۡمُهُۥۚ قَالَ أَتُحَـٰٓجُّوٓنِّي فِي ٱللَّهِ وَقَدۡ هَدَىٰنِۚ وَلَآ أَخَافُ مَا تُشۡرِكُونَ بِهِۦٓ إِلَّآ أَن يَشَآءَ رَبِّي شَيۡـٔٗاۚ وَسِعَ رَبِّي كُلَّ شَيۡءٍ عِلۡمًاۚ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ

Transliteration: (Wa haaajjahoo qawmuh; qaala a-tuh'haaajjooonnee fillaahi wa qad hadaan; wa laaa akhaafu maa tushrikoona bihee illaaa ai yashaaa'a Rabbee shai'anw wasi'a Rabbee kulla shai'in 'ilman afalaa tatazakkaroon)

और उसकी क़ौम ने उससे अल्लाह के बारे में झगड़ा किया। उसने कहा: क्या तुम मुझसे अल्लाह के बारे में झगड़ते हो, जबकि उसने मुझे राह दिखा दी है? मैं उन (झूठे) को नहीं डरता, जिन्हें तुम उसका शरीक ठहराते हो [160], मगर यह कि मेरा रब कुछ चाहता हो [161]। मेरा रब अपने ज्ञान में हर चीज़ को घेरे हुए है। तो क्या तुम सोचते नहीं? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 80 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-अनआम – आयत 80

✅ [159]

जब उनकी क़ौम ने बहस की, तो हज़रत इब्राहीम عليه السلام ने याद दिलाया कि अल्लाह ने उन्हें पहले ही राह दिखा दी है। यह हिदायत पाक और फ़ितरी थी, और बचपन से ही उन्हें अल्लाह का सही इल्म था। तमाम नबियों की तरह वे शिर्क, कुफ्र और गुनाह से महफ़ूज़ थे। उनकी क़ौम की बातें अल्लाह की सच्ची हिदायत के सामने बेमानी थीं।

✅ [160]

इब्राहीम عليه السلام ने साफ़ कहा कि वे झूठे माबूदों से नहीं डरते। हर नुक़सान या फ़ायदा सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म से होता है। अगर कोई नुक़सान इंसानों के हाथ से भी हो, तो वह भी अल्लाह की इजाज़त से ही होता है, न कि माबूदों से। उन्होंने खुलकर अपने ईमान का इज़हार किया और किसी डर या तक़य्या का सहारा नहीं लिया।

✅ [161]

कुफ़्फ़ार के माहौल में भी इब्राहीम عليه السلام के दिल में मख़लूक़ का डर नहीं आया। नबी हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखते हैं, न कि मख़लूक़ के ख़ौफ़ से प्रभावित होते हैं। उनका पूरा भरोसा अल्लाह के इल्म और हिकमत पर था, जिसने उनकी क़ौम की दलीलों को खामोश कर दिया और उन्हें तदब्बुर की दावत दी।

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