Transliteration: (Wa haaajjahoo qawmuh; qaala a-tuh'haaajjooonnee fillaahi wa qad hadaan; wa laaa akhaafu maa tushrikoona bihee illaaa ai yashaaa'a Rabbee shai'anw wasi'a Rabbee kulla shai'in 'ilman afalaa tatazakkaroon)
जब उनकी क़ौम ने बहस की, तो हज़रत इब्राहीम عليه السلام ने याद दिलाया कि अल्लाह ने उन्हें पहले ही राह दिखा दी है। यह हिदायत पाक और फ़ितरी थी, और बचपन से ही उन्हें अल्लाह का सही इल्म था। तमाम नबियों की तरह वे शिर्क, कुफ्र और गुनाह से महफ़ूज़ थे। उनकी क़ौम की बातें अल्लाह की सच्ची हिदायत के सामने बेमानी थीं।
इब्राहीम عليه السلام ने साफ़ कहा कि वे झूठे माबूदों से नहीं डरते। हर नुक़सान या फ़ायदा सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म से होता है। अगर कोई नुक़सान इंसानों के हाथ से भी हो, तो वह भी अल्लाह की इजाज़त से ही होता है, न कि माबूदों से। उन्होंने खुलकर अपने ईमान का इज़हार किया और किसी डर या तक़य्या का सहारा नहीं लिया।
कुफ़्फ़ार के माहौल में भी इब्राहीम عليه السلام के दिल में मख़लूक़ का डर नहीं आया। नबी हर हाल में अपने रब पर भरोसा रखते हैं, न कि मख़लूक़ के ख़ौफ़ से प्रभावित होते हैं। उनका पूरा भरोसा अल्लाह के इल्म और हिकमत पर था, जिसने उनकी क़ौम की दलीलों को खामोश कर दिया और उन्हें तदब्बुर की दावत दी।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat