Transliteration: (Allazeena aamanoo wa lam yalbisooo eemaanahum bizulmin ulaaa'ika lahumul amnu wa hum muhtadoon)
इस आयत में ईमान का मतलब है दिल और ज़बान से अल्लाह पर यक़ीन, और ज़ुल्म से मुराद है शिर्क। मक्का के काफ़िर भी अल्लाह पर यक़ीन रखते थे, लेकिन उसके साथ दूसरे को शामिल करते थे, यह समझते हुए कि यह तौहीद में कमी नहीं लाता। यह आयत उस ग़लतफ़हमी को पूरी तरह ख़ारिज करती है। यहाँ बात गुनहगार मुसलमानों की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो अपने ईमान में शिर्क मिलाते हैं — जैसा कि सूरा लुक़मान:13 में आया है।
जो लोग तौहीद को पूरी तरह थामे रहते हैं, उन्हें असली अमान मिलता है — दुनिया में, क़ब्र में और आख़िरत में। ये लोग शिर्क से बचे रहते हैं, और चाहे उन्हें दुनिया में आज़माइश का सामना करना पड़े, वे अल्लाह के अज़ाब से महफ़ूज़ रहेंगे। ऐसे लोग ही असली राहे-रास्त पर होते हैं और अल्लाह की रहमत से महफ़ूज़ रहते हैं।
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