Transliteration: (Wa laqad ji'tumoonaa furaadaa kamaa khalaqnaakum awwala marratinw wa taraktum maa khawwalnaakum waraaa'a zuhoorikum wa maa naraa ma'akum shufa'aaa' akumul lazeena za'amtum annahum feekum shurakaaa'; laqat taqatta'a bainakum wa dalla 'annkum maa kuntum taz'umoon)
यह आयत काफ़िरों को झिड़कती है जो माल और औलाद से इतने जुड़े थे कि अल्लाह को भूल गए। क़ियामत के दिन वे उसी तरह अकेले और ख़ाली हाथ लौटेंगे जैसे पैदा हुए थे। उनके कल्पित सहारे—मूर्तियाँ और दुनियावी लगाव—साथ नहीं होंगे और न ही उनका बचाव करेंगे।
काफ़िर अपने धन, सत्ता और प्रभाव सब पीछे छोड़ देंगे। मोमिनों को उनके नेक आमाल फ़ायदा देंगे, लेकिन काफ़िर अकेले खड़े होंगे—न कोई सिफ़ारिश, न वह इनाम जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी।
काफ़िर अपने मूर्तियों को मददगार और अल्लाह के सामने सिफ़ारिशी मानते थे। वे समझते थे कि ये अल्लाह की मदद करेंगे। लेकिन उस दिन न ये मूर्तियाँ होंगी, न उनकी कोई मदद। उनके ग़लत अकीदे पूरी तरह बेनक़ाब हो जाएंगे।
जहाँ काफ़िर अकेले होंगे, वहीं मोमिन अपने सच्चे दोस्तों—अल्लाह, रसूल ﷺ और नेक लोगों—के साथ होंगे। मोमिन अपने पाक औलाद के साथ भी मिलेंगे, जबकि काफ़िरों के रिश्ते हमेशा के लिए टूट जाएंगे।
शैतान और मूर्तियाँ जिन्होंने काफ़िरों को सुरक्षा और मदद का भरोसा दिया था, मौजूद नहीं होंगे। उनकी सिफ़ारिश और निजात की दावेबाज़ी मिट जाएगी और उनकी सारी उम्मीदें टूट जाएंगी।
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