कुरान - 6:99 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

99
وَهُوَ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَخۡرَجۡنَا بِهِۦ نَبَاتَ كُلِّ شَيۡءٖ فَأَخۡرَجۡنَا مِنۡهُ خَضِرٗا نُّخۡرِجُ مِنۡهُ حَبّٗا مُّتَرَاكِبٗا وَمِنَ ٱلنَّخۡلِ مِن طَلۡعِهَا قِنۡوَانٞ دَانِيَةٞ وَجَنَّـٰتٖ مِّنۡ أَعۡنَابٖ وَٱلزَّيۡتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُشۡتَبِهٗا وَغَيۡرَ مُتَشَٰبِهٍۗ ٱنظُرُوٓاْ إِلَىٰ ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثۡمَرَ وَيَنۡعِهِۦٓۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكُمۡ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Wa Huwal lazeee anzala minas samaaa'i maaa'an fa akhrajnaa bihee nabaata kulli shai'in fa akhrajnaa minhu khadiran nukhriju minhu habbam mutaraakibanw wa minan nakhli min tal'ihaa qinwaanun daaniyatunw wa jannaatim min a'naabinw wazzaitoona warrummaana mushtabihanw wa ghaira mutashaabih; unzurooo ilaa samariheee izaaa asmara wa yan'ih; inna fee zaalikum la Aayaatil liqawminy yu'minoon)

वही (अल्लाह) है जिसने हर उगने वाली चीज़ [215] उगाई, फिर उससे हरा-भरा (पत्तों वाला) निकाला, फिर उससे गुच्छों में अनाज निकाला, और खजूर के थैलों से एक-दूसरे के क़रीब लगे हुए गुच्छे [216], और अंगूर, जैतून और अनार के बाग़ात [217] — कुछ चीज़ें आपस में मिलती-जुलती और कुछ अलग-अलग [218]। देखो उसे, जब वह फल लाता है और उसके पकने का समय आता है। बेशक, इसमें ईमान लाने वालों के लिए निशानियां हैं [219]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 99 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-अनआम – आयत 99

✅ [215] हर उगने वाली चीज़ अल्लाह के पोषण से

यह आयत बताती है कि सारी वनस्पति और प्राकृतिक बढ़त अल्लाह के हुक्म और पानी के ज़रिये होती है। सूफ़ी बुज़ुर्ग इसे रूहानी हक़ीक़त भी बताते हैं — जैसे अनाज पानी के बिना नहीं उगता, वैसे ही अमल-ए-सालेह (नेक काम) भी नबियों और औलिया की बरकत के बिना फल नहीं देते। इब्लीस के पास इबादत थी, मगर वह फलहीन रही क्योंकि उसमें नुबूवत का पानी नहीं था।

✅ [216] गुच्छों में अनाज – एकता की मिसाल

हरे पौधों से गुच्छेदार अनाज (गेहूं, जौ) और खजूर के पास-पास लगे गुच्छे अल्लाह की तदबीर और तरतीब की निशानी हैं। ये दिखाते हैं कि कैसे वही से मुंतज़िम और आपस में जुड़े हुए फल निकलते हैं — जैसे इल्म और हिकमत सिर्फ़ इलाही रहनुमाई से हासिल होती है।

✅ [217] जिस्म और रूह की ग़िज़ा

अंगूर, जैतून, अनार के बाग़ात सिर्फ़ जिस्मानी ग़िज़ा नहीं, बल्कि रूहानी अलामतें भी हैं। जैसे ख़ुराक जिस्म को तवानाई देती है, वैसे ही शरीअत रूह को ग़िज़ा देती है, और तरीक़त उस बढ़त का शीरिन फल है — एक अदब व अनुशासन के लिए, दूसरा लज़्ज़त और मारिफ़त के लिए।

✅ [218] शक्ल में मिलते-जुलते, फल में अलग

दरख़्त बाहरी रूप में मिलते-जुलते होते हैं, मगर उनके फूल और फल अलग होते हैं। यह इंसानों की मिसाल है — ज़ाहिर से धोखा हो सकता है। दो लोग एक जैसे दिखें, मगर एक नबी, वली या आलिम हो सकता है और दूसरा गुमराह। जैसे सोना और पीतल दोनों चमकते हैं, मगर अस्लियत में फ़र्क़ रखते हैं।

✅ [219] ईमान वाले पकने में निशानियां देखते हैं

"देखो जब वह फल लाता है और पकता है" — यह हुक्म ज़ाहिरी और मजाज़ी दोनों है। फल का पकना हश्र (क़यामत के बाद उठना) की याद दिलाता है — जो बीज से फल निकाल सकता है, वही मौत से ज़िंदगी भी दे सकता है। यह इस बात की भी दलील है कि एक नबी से निकलकर हज़ारों औलिया, उलमा और सूफ़िया पैदा होते हैं — इलाही रहनुमाई के पानी से खिला हुआ एक रूहानी बाग़।

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