कुरान - 8:31 सूरह अल-अन्फाल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

31
وَإِذَا تُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡ ءَايَٰتُنَا قَالُواْ قَدۡ سَمِعۡنَا لَوۡ نَشَآءُ لَقُلۡنَا مِثۡلَ هَٰذَآ إِنۡ هَٰذَآ إِلَّآ أَسَٰطِيرُ ٱلۡأَوَّلِينَ

Transliteration: (Wa izaa tutlaa 'alaihim Aayaatunaa qaaloo qad sami'naa law nashaaa'u laqulnaa misla haazaaa in haazaaa illaaa asaateerul awwaleen)

और जब उनकी तरफ़ हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं,
तो वे कहते हैं:
"हमने तो सुन लिया [64]।
अगर हम चाहें तो इसके जैसा हम भी कह सकते हैं।
यह तो बस पहले लोगों की कहानियाँ हैं।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अन्फाल आयत 31 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनफ़ाल – आयत 31 की तफ़्सीर

✅ [64] अल्लाह की आयतों का घमंडी इन्कार

यह आयत नज़्र बिन हारिस के बारे में नाज़िल हुई।
वह घमंड से कहता था कि
कुरआन इंसानों की बनाई हुई बात है,
और अगर वह चाहे तो इसके जैसी बातें खुद गढ़ सकता है।
लेकिन यह केवल ख़ाली दावे थे।
क्योंकि कुरआन ने अरब के सबसे बड़े शायरों और फ़सीह-ओ-बलीग़ लोगों को
चुनौती दी थी कि वे इसकी तरह
एक सूरत ही बना कर दिखाएँ –
मगर कोई नाकामयाब रहा।
उनका कहना कि यह अक़दामीन की कहानियाँ हैं,
सिर्फ़ हठ और इन्कार था,
वरना कुरआन की फ़साहत, बलाग़त, हक़ीक़त और हिकमत
खुली हुई दलीलें थीं।

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